கொடுமையாய் இருக்கும் என் காதல் / தபு ஷங்கர் கவிதைகள்

வரதட்சிணை எல்லாம் கேட்டு உன்னைக் கொடுமைப்படுத்திவிட மாட்டேன். ஆனால் அதைவிடக் கொடுமையாய் இருக்கும் என் காதல்.

ஒரு ரோஜா / தபு ஷங்கர் கவிதைகள்

என்னிடம் பரிசுப் பொருளாக ஒரு ரோஜாவை கேட்கிறது உன் மௌனம் ஆனால் உன்னை காதலிக்க ஆரம்பித்தபோதே பூக்களயும் நேசிக்க ஆரம்பித்துவிட்டது மனசு எப்படி பறிப்பேன் ஒரு ரோஜாவை

उद्याचा मी म्हणून / दिनेश हंचाटे

उद्याचा उगवणारा दिवस माझा आहे म्हणून जगत असतो, पण उद्याचा दिवस आज म्हणून येतो, तो कालचा झालेला असतो. उद्याचा जन्मणारा बाळ आहे म्हणून तरसत असतो, पण उद्याचा माझा बाळ तरुण म्हणून होतो, तो दुसर्‍याचा झालेला असतो. उद्याची कोमललेली सकाळ आहे म्हणून तरळत असतो, पण उद्याची सकाळ संध्याकाळ म्हणून येते, आणि ती चंद्राची झालेली असते. उद्याचा… Continue reading उद्याचा मी म्हणून / दिनेश हंचाटे

दुंहु ओर से फाग मड़ी उमड़ी / पजनेस

दुँहु ओर से फाग मड़ी उमड़ी जहँ श्री चढ़ि भीर ते भीर भिरी । कुच कँचुकी कोर छुये घरकै पजनेस फँदी फरकै ज्योँ चिरी । धधकी दै गुलाल की घूँघुरि मेँ धरी गोरी लला मुख मीढ़ी सिरी । उझकै झँपै कौँधे कढ़ै तड़िता तड़पै मनौ लाल घटा मे घिरी ।

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फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा / पंडित बृज मोहन दातातर्या कैफ़ी

फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा वही अफ़्साना-ए-हस्ती का मीर-ए-दास्ताँ होगा यक़ीं जिस का कलाम-ए-क़ुद्स अज्र-उल-मुहसेनीं पर हो निक-कारी का उस की क़ाएल इक दिन कुल जहाँ होगा हयात-ए-जावेदनी पाएगा वो इश्क़-ए-सादिक़ में जो अनक़ा की तरह मादूम होगा बे-निशाँ होगा सफ़र राह-ए-मोहब्बत का चहल-क़दमी समझते हो अभी देखोगे तुम… Continue reading फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा / पंडित बृज मोहन दातातर्या कैफ़ी

ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं / पंडित बृज मोहन दातातर्या कैफ़ी

ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं सच अगर पूछो तो सच्चा आश्ना मिलता नहीं आप के जो यार बनते हैं वो हैं मतलब के यार इस ज़माने में मुहिब्ब-ए-बा-सफ़ा मिलता नहीं सीरतों में भी है इंसानों की बाहम इख़्तिलाफ़ एक के सूरत में जैसे दूसरा मिलता नहीं दैर ओ काबा में… Continue reading ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं / पंडित बृज मोहन दातातर्या कैफ़ी

उम्र / पंखुरी सिन्हा

जैसे सुबह उठकर कोई शीशे में देखे, कि कुछ बाल कनपटी पर सफ़ेद हो गए हैं, कि एक रेखा खिंचती है गालों में, अब हँसने पर, वैसे सुबह उठकर लड़की ने शीशे में देखा, कि अब वह बिल्कुल प्यार नहीं करती, उस आदमी से, जिसके साथ, उसका तथाकथित प्यार का रिश्ता है, और ज़िन्दगी उसके… Continue reading उम्र / पंखुरी सिन्हा