Qateel Shifai Archive

नामाबर अपना हवाओं को बनाने वाले / क़तील

नामाबर अपना हवाओं को बनाने वाले अब न आएँगे पलट कर कभी जाने वाले क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख़्वाबों के सिवा रेत पर चाँद की तसवीर बनाने वाले मैक़दे बन्द हुए ढूँढ रहा हूँ तुझको तू कहाँ है मुझे …

धूप है रंग है या सदा है / क़तील

धूप है ,रंग है या सदा है रात की बन्द मुट्ठी में क्या है छुप गया जबसे वो फूल-चेहरा शहर का शहर मुरझा गया है किसने दी ये दरे-दिल पे दस्तक ख़ुद-ब-ख़ुद घर मेरा बज रहा है पूछता है वो …

यह मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे / क़तील

यह मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे कि संग तुझ पे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को बदन मेरा ही सही दोपहर न भाए मुझे ब-रंग-ए-ऊद मिलेगी उसे मेरी ख़ुश्बू वो जब भी …

निगाहों में ख़ुमार आता हुआ महसूस होता है / क़तील

निगाहों में ख़ुमार आता हुआ महसूस होता है तसव्वुर जाम छलकाता हुआ महसूस होता है ख़िरामे- नाज़ -और उनका ख़िरामे-नाज़ क्या कहना ज़माना ठोकरें खाता हुआ महसूस होता है ये एहसासे-जवानी को छुपाने की हसीं कोशिश कोई अपने से शर्माता …

शम्मअ़-ए-अन्जुमन / क़तील

मैं ज़िन्दगी की हर-इक साँस को टटोल चुकी मैं लाख बार मुहब्बत के भेद खोल चुकी मैं अपने आपको तनहाइयों में तोल चुकी मैं जल्वतों में सितारों के बोल बोल चुकी -मगर कोई भी न माना वफा़ के दाम बिछाए …

काम आ गई दीवानगी अपनी / क़तील

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते जो वाबस्ता हुए, तुमसे, वो अफ़साने कहाँ जाते निकलकर दैरो-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाखाने की तुम …

ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं / क़तील

ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिये थोड़ी है इक ज़रा सा ग़म-ए-दौराँ का भी …

यूँ चुप रहना ठीक नहीं कोई मीठी बात करो / क़तील

यूँ चुप रहना ठीक नहीं कोई मीठी बात करो मोर चकोर पपीहा कोयल सब को मात करो सावन तो मन बगिया से बिन बरसे बीत गया रस में डूबे नग़्मे की अब तुम बरसात करो हिज्र की इक लम्बी मंज़िल …

यों लगे दोस्त तेरा मुझसे ख़फ़ा हो जाना / क़तील

यों लगे दोस्त तेरा मुझसे ख़फ़ा हो जाना जिस तरह फूल से ख़ुश्बू का जुदा हो जाना अहल-ए-दिल से ये तेरा तर्क-ए-त’अल्लुक़ वक़्त से पहले असीरों का रिहा हो जाना यों अगर हो तो जहाँ में कोई काफ़िर न रहे …

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे / क़तील

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे वो महरबाँ है तोप इक़रार क्यूँ नहीं करता वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को बदन …