Qateel Shifai Archive

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें / क़तील

खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़मत-ए-किरदार आओ सच बोलें …

विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है / क़तील

विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है वो रंग तू ने मेरी निगाहों पे जो बिखेरा पलट गया है कहाँ की ज़ुल्फ़ें कहाँ के बादल सिवाए तीरा-नसीबों के मेरी नज़र ने जिसे पुकारा वही अँधेरा पलट …

तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले / क़तील

तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-ना-काम से पहले ये आलम देख कर तू ने भी आँखें फेर लीं वरना कोई गर्दिश नहीं थी गर्दिश-ए-अय्याम से पहले गिरा है टूट कर शायद मेरी तक़दीर …

सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो / क़तील

सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो रात का पत्थर न पिघलेगा शुआओं के बग़ैर सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं …

शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है / क़तील

शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है दरवाज़ा मेरे घर का बीनाई चाहता है औक़ात-ए-ज़ब्त उस को ऐ चश्म-ए-तर बता दे ये दिल समंदरों की गहराई चाहता है शहरों में वो घुटन है इस दौर में के इंसाँ गुमनाम जंगलों …

फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा / क़तील

फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा अब है यही इंसाफ़ का आलम देखने वाले देखता जा परवानों की राख उड़ा दी बाद-ए-सहर के झोंकों ने शम्मा बनी है पैकर-ए-मातम देखने वाले देखता जा जाम-ब-जाम लगी हैं …

मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था / क़तील

मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था वो इस लिए के राह का पत्थर भी मैं ही था शक हो चला था मुझ को ख़ुद अपनी ही ज़ात पर झाँका तो अपने ख़ोल के अंदर भी …

क्या जाने किस ख़ुमार में / क़तील

क्या जाने किस ख़ुमार में किस जोश में गिरा वो फल शजर से जो मेरी आग़ोश में गिरा कुछ दाएरा से बन गए साथ-ए-ख़याल पर जब कोई फूल साग़र-ए-मय-नोश में गिरा बाक़ी रही न फिर वो सुनहरी लकीर भी तारा …

जब अपने एतिक़ाद के महवर से हट गया / क़तील

जब अपने एतिक़ाद के महवर से हट गया मैं रेज़ा रेज़ा हो के हरीफ़ों में बट गया दुश्मन के तन पे गाड़ दिया मैं ने अपना सर मैदान-ए-कार-जार का पाँसा पलट गया थोड़ी सी और ज़ख़्म को गहराई मिल गई …

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ / क़तील

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ शीशे के महल बना रहा हूँ सीने में मेरे है मोम का दिल सूरज से बदन छुपा रहा हूँ महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना आईना उसे दिखा रहा हूँ अहबाब को दे रहा हूँ धोका …