Qateel Shifai Archive

यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो / क़तील

यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो अपने ही गले के लिये तलवार न माँगो गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से मर कर भी इलाज-ए-दिल-ए-बीमार न माँगो खुल जायेगा इस तरह निगाहों का भरम भी काँटों से …

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे / क़तील

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे मैं तुझको भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िन्दगी बनकर ये और बात मेरी ज़िन्दगी वफ़ा न करे ये ठीक है नहीं मरता कोई …

वफ़ा के शीशमहल में सजा लिया मैनें / क़तील

वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें कभी न ख़त्म किया मैं …

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू / क़तील

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला, तू बाँहें डाल के बाँहों में दिल तोड़ने वाले देख के चल, हम भी तो पड़े हैं राहों में क्या क्या न जफ़ायेँ दिल पे सहीं, पर तुम से कोई शिकवा न किया इस …

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते / क़तील

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते निकल कर दैर-ओ-क़ाबा से अगर मिलता न मैख़ाना तो ठुकराए हुए इन्साँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की …

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है / क़तील

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला ज़िन्दगी ने मुझे दाँव पे लगा रखा है जाने कब आये कोई दिल में झाँकने …

तुम पूछो और मैं ना बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं / क़तील

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं …

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये / क़तील

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये रास आया नहीं तस्कीं का साहिल कोई फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें क़ातिल तुझको किस नाम से …

सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं / क़तील

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद बेकार महफ़िलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं मैं ख़ुदकशी के जुर्म …

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में / क़तील

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में हमने ख़ुश होके भँवर बाँध लिये पावों में उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश बूँद तक बो न सके जो कभी सहराओं में ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी …