खलिश की इन्तहा देखी है तुमने? निगाहों की खता देखी है तुमने? मेरे सीने का खालीपन पता है? मेरे दिल की खला देखी है तुमने? तुम्हें कैसे दिखाऊं अपनी आहें? कहो तो! क्या हवा देखी है तुमने? तुम्हें मालूम कैसे ख़त्म होगा? सफर की इब्तेदा देखी है तुमने? मेरे जी मैं जो है यूँ ही… Continue reading हवा देखी है तुमने? / संकल्प शर्मा
Author: poets
अगडू़-झगडू़ / होरीलाल शर्मा ‘नीरव’
आजू-राजू दोनों दो-दो गुब्बारे ले आए माँ को पास बिठाकर अगडू़-झगडू़ दो बनवाए। पेट बड़ा-सा, छोटा-सा सिर बिल्कुल ढीलम-ढालू, जैसे लाल टमाटर पर हो रक्खा छोटा आलू। निकली तब तक हवा पिचककर गिरे भूमि पर झगडू़, रहे देखते बड़ी देर तक आँखें फाड़े अगडू़।
बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए / हैरत इलाहाबादी
बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए ज़ुल्फ़ें छूईं बला में गिरफ़्तार हो गए सकता है बैठे सामने तकते हैं उन की शक्ल क्या हम भी अक्स-ए-आईना-ए-यार हा ेगए बैठै तुम्हारे दर पे तो जुम्बिश तलक न की ऐसे जमे कि साया-ए-दीवार हो गए हम को तो उन के ख़ंजर-ए-अबरू के इश्क़ में दिन… Continue reading बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए / हैरत इलाहाबादी
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं / हैरत इलाहाबादी
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं सामान सौ बरस के हैं कल की ख़बर नहीं आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़ अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज… Continue reading आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं / हैरत इलाहाबादी
आइना सीना-ए-साहब-नज़राँ है कि जो था / हैदर अली ‘आतिश’
आइना सीना-ए-साहब-नज़राँ है कि जो था चेहरा-ए-शाहिद-ए-मक़सूद अयाँ है कि जो था इश्क़-ए-गुल में वही बुलबुल का फ़ुगाँ है कि जो था परतव-ए-मह से वही हाल-ए-कताँ है कि जो था आलम-ए-हुस्न ख़ुदा-दाद-ए-बुताँ है कि जो था नाज़ ओ अंदाज़ बला-ए-दिल-ओ-जाँ है कि जो था राह में तेरी शब ओ रोज़ बसर करता हूँ वही मील… Continue reading आइना सीना-ए-साहब-नज़राँ है कि जो था / हैदर अली ‘आतिश’
ये शरद की चाँदनी / हेमन्त श्रीमाल
शोख चंचल चुलबुली है, ये शरद की चाँदनी इस कदर मादक नहीं था मरमरी कोमल बदन उम्र में शामिल हुआ है एक अल्हड़ बाँकपन रूप में ख़ुद आ घुली है, ये शरद की चाँदनी स्वप्न बुनती जा रही है जो मिलन के हर जगह सेज पर फिर बिछ रही है एक चादर की तरह दूधिया… Continue reading ये शरद की चाँदनी / हेमन्त श्रीमाल
फागुन आया रे / हेमन्त श्रीमाल
फागुन आया रे गलियों गलियों र।ग गुलाल कुमकुम केसर के सौ थाल भर-भर लाया रे फागुन आया रे होंठ हठीले रंगे गुलाबी और नयन कजरारे बिन्दिया की झिलमिल में लाखों चमक रहे ध्रुवतारे लहँगा नीला चुनरी लाल पीले कंचुक में कुसुमाल तन लहराया रे फागुन आया रे अ।ग-अ।ग में र।ग लिए चलती-फिरती पिचकारी चला रही… Continue reading फागुन आया रे / हेमन्त श्रीमाल
रोज़ समय का चाकू / हेमन्त शेष
रोज़ समय का चाकू हमारा दुनिया का सेब चीरता है घिरते हुए शोक की पौष्टिकता में हम प्रफुल्लित होते हैं दोनों एक से हैं– स्वास्थ्य और बीमारी चाकू के सामने कटती हुई दुनिया में
जल गई है कोई कंदील मेरे भीतर/ हेमन्त शेष
जल गई है कोई कन्दील मेरे भीतर और शब्दों का मोम पिघलना शुरू हो गया है यों बहुत दिनों बाद खुली खिड़की कविता की
बेझिझक / हेमन्त प्रसाद दीक्षित
झिझके हुए शब्द का मुँह धुलवाया / ठीक से अरामकुर्सी पर बैठाया / ताज़गी बरक़रार रखने के लिए काफी पिलायी / और पूछा झिझक के बारे में। पता चला कि झिझकता रहा शम्बूक का वध करने में / मगर वर्ण-व्यवस्था का क्या होता / पुरोहित चढ़ाए बैठे थे त्योरियाँ / और उस निरपराध का सिर… Continue reading बेझिझक / हेमन्त प्रसाद दीक्षित