मुक्ति के लिए कविता / चंद्र कुमार जैन

शब्दों की अर्थवत्ता को तोड़ने और व्यर्थ अर्थों की सत्ता को छोड़ने के बाद जो रची जाएगी वही होगी जागरण की कविता ! करेगी संघर्श वह दिन – प्रतिदिन सीमित होते सुखों के खिलाफ टूटेगी नहीं वह जीवित रखेगी अपनी आँखों में सुख और सौंदर्य के सपनों को मांजेगी अपने दु:खों से अपना तन !… Continue reading मुक्ति के लिए कविता / चंद्र कुमार जैन

क़द / चंद्र कुमार जैन

अपने कद को ध्यान में रखकर उसने खड़ी की ऊँची दीवारें और बनाया एक गगनचुंबी महल अब क्या है महल ही जब ऊँचा हो गया तो आदमी का कद…..!!!

मुझे उनसे मिलना है / चंद्र कुमार जैन

मूझे उनसे मिलना है जो कम से कम यह जानते हैं कि वे कुछ नहीं जानते ! मुझे उनसे मत मिलाना जो अपनी जानकारी को ही विज्ञान समझते हैं ! और मुझे मिलना है उनसे जो अपना घर जलाकर औरों की दुनिया रौशन करते हैं ! मुझे उनसे मत मिलाना जो दूसरों के अंधेरे में… Continue reading मुझे उनसे मिलना है / चंद्र कुमार जैन

पतझर का झरना देखो तुम / चंद्र कुमार जैन

मधु-मादक रंगों ने बरबस, इस तन का श्रृंगार किया है ! रंग उसी के हिस्से आया, जिसने मन से प्यार किया है ! वासंती उल्लास को केवल, फागुन का अनुराग न समझो ! ढोलक की हर थाप को केवल, मधुऋतु की पदचाप न समझो !! भीतर से जो खुला उसी ने, जीवन का मनुहार किया… Continue reading पतझर का झरना देखो तुम / चंद्र कुमार जैन

एक दीप सूरज के आगे / चंद्र कुमार जैन

लीक से हटकर अलग चाहे हुआ अपराध मुझसे, सच कहूँ, सूरज के आगे दीप मैंने रख दिया है ! प्रश्नों के उत्तर नये देकर उलझना जानता हूँ , और हर उत्तर में जलते प्रश्न को पहचानता हूँ ! जाने क्यों संसार मेरे प्रश्न पर कुछ मौन सा है , तोड़ने इस मौन का हर स्वाद… Continue reading एक दीप सूरज के आगे / चंद्र कुमार जैन

कुछ छंद / चंदबरदाई

१. ‘चन्द’ प्यारो मितु, कहो क्यों पाईऐ करहु सेवा तिंह नित, नहिं चितह भुलाईऐ गुनि जन कहत पुकार, भलो या जीवनो हो बिन प्रीतम केह काम, अमृत को पीवनो। २. अंतरि बाहरि ‘चन्द’ एक सा होईऐ मोती पाथर एक, ठउर नहिं पाईऐ हिये खोटु तन पहर, लिबास दिखाईऐ हो परगटु होइ निदान, अंत पछुताईऐ। ३.… Continue reading कुछ छंद / चंदबरदाई

तन तेज तरनि ज्यों घनह ओप / चंदबरदाई

तन तेज तरनि ज्यों घनह ओप . प्रगटी किरनि धरि अग्नि कोप . चन्दन सुलेप कस्तूर चित्र . नभ कमल प्रगटी जनु किरन मित्र. जनु अग्निं नग छवि तन विसाल . रसना कि बैठी जनु भ्रमर व्याल . मर्दन कपूर छबि अंग हंति . सिर रची जानि बिभूति पंति . कज्जल सुरेष रच नेन संति… Continue reading तन तेज तरनि ज्यों घनह ओप / चंदबरदाई

प्रन्म्म प्रथम मम आदि देव / चंदबरदाई

प्रन्म्म प्रथम मम आदि देव ऊंकार सब्द जिन करि अछेव निरकार मध्य साकार कीन मनसा विलास सह फल फलीन बरन्यौ आदि-करता अलेख गुन सहित गुननि नह रूप रेख जिहि रचे सुरग भूसत पताल जम ब्रम्ह इन्द्र रिषी लोकपाल असि-लक्ख-चार रच जीव जंत बरनंत ते न लहों अंत करि सके न कोई अग्याहि भंग धरि हुकुम… Continue reading प्रन्म्म प्रथम मम आदि देव / चंदबरदाई

पद्मावती / चंदबरदाई

पूरब दिसि गढ गढनपति, समुद-सिषर अति द्रुग्ग। तहँ सु विजय सुर-राजपति, जादू कुलह अभग्ग॥ हसम हयग्गय देस अति, पति सायर म्रज्जाद। प्रबल भूप सेवहिं सकल, धुनि निसाँन बहु साद॥ धुनि निसाँन बहुसाद नाद सुर पंच बजत दिन। दस हजार हय-चढत हेम-नग जटित साज तिन॥ गज असंष गजपतिय मुहर सेना तिय सक्खह। इक नायक, कर धरि… Continue reading पद्मावती / चंदबरदाई

पृथ्वीराज रासो / चंदबरदाई

पद्मसेन कूँवर सुघर ताघर नारि सुजान। ता उर इक पुत्री प्रकट, मनहुँ कला ससभान॥ मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय। बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥ बिगसि कमल-स्रिग, भ्रमर, बेनु, खंजन, म्रिग लुट्टिय। हीर, कीर, अरु बिंब मोति, नष सिष अहि घुट्टिय॥ छप्पति गयंद हरि हंस गति, बिह बनाय संचै सँचिय। पदमिनिय… Continue reading पृथ्वीराज रासो / चंदबरदाई