भारत की जय / चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, क्रिस्ती, मुसलमान पारसीक, यहूदी और ब्राह्मन भारत के सब पुत्र, परस्पर रहो मित्र रखो चित्ते गणना सामान मिलो सब भारत संतान एक तन एक प्राण गाओ भारत का यशोगान

झुकी कमान / चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

(1) आए प्रचंड रिपु, शब्द सुन उन्हीं का, भेजी सभी जगह एक झुकी कमान ज्यों युद्ध चिह्न समझे सब लोग धाए, त्यों साथ थी कह रही यह व्योम वाणी – ‘सुना नहीं क्या रणशंखनाद ? चलो पके खेत किसान छोड़ो पक्षी इन्हें खाएँ, तुम्हें पड़ा क्या? भाले भिदाओ, अब खड्ग खोलो हवा इन्हें साफ किया… Continue reading झुकी कमान / चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

बिल्ली बोली / चंद्रदत्त ‘इंदु’

दिल्ली में कितने दरवाजे? दिल्ली में हैं कितने राजे? कितनी लंबी है यह दिल्ली? कहाँ गढ़ी दिल्ली की किल्ली? दिल्ली कब से कहाँ गई? कब टूटी, कब बनी नई? दूध-मलाई खिलवाओ तो सारे उत्तर अभी बताऊँ! बिल्ली बोली म्याऊँ-म्याऊँ! मैं बिल्ली मंत्री के घर की, मुझे खबर है दुनिया भर की। मैं घूमती सारा इंग्लैंड,… Continue reading बिल्ली बोली / चंद्रदत्त ‘इंदु’

छोटा अन्ने / चंद्रदत्त ‘इंदु’

छोटा अन्ने, मीठे गन्ने बड़े मजे से खाता, कोई उससे गन्ना माँगे उसको जीभ चिढ़ाता! मम्मी बोली-‘अन्ने बेटा, मुझको दे दो गन्ने!’ ‘ये कड़वे हैं, तुम मत खाओ!’ झट से बोला अन्ने।

अट्टू-बट्टू / चंद्रदत्त ‘इंदु’

एक था अट्टू, एक था बट्टू एक था उनका घोड़ा, अट्टू बैठा, बट्टू बैठा तड़-तड़ मारा कोडा। कोड़ा खाकर घोड़ा भागा सँभल न पाया बट्टू, गिरा जमीं पर, रोकर बोला- घोड़ा बड़ा लिखट्टू!

एक थी गुड्डी / चंद्रदत्त ‘इंदु’

चिट्ठी पढ़ी तुम्हारी गुड्डी, उल्लू हिला रहा था ठुड्डी। शैतानी से बाज न आता, चपत लगा, बाहर भग जाता। पापा जब दफ्तर से आते, कुल्हड़ भर रसगुल्ले लाते। कला दिखाता काला बंदर, मैना है पिंजरे के अंदर। भालू दादा आँख नचाते, हाथी दादा सूँड हिलाते। याद तुम्हारी सबको आती, पूसी मौसी यह लिखवाती। खूब लगन… Continue reading एक थी गुड्डी / चंद्रदत्त ‘इंदु’

बोल मेरी मछली / चंद्रदत्त ‘इंदु’

हरा समंदर गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी? ठहर-ठहर तू चड्ढी लेता, ऊपर से करता शैतानी! नीचे उतर अभी बतलाऊँ, कैसी मछली, कितना पानी? मैं ना उतरूँ, चड्ढी लूँगा, ना दोगी कुट्टी कर दूँगा! या मुझको तुम लाकर दे दो, चना कुरकुरा या गुड़धानी! दद्दा लाए गोरी गैया, खूब मिलेगी दूध-मलैया! आओ भैया नीचे… Continue reading बोल मेरी मछली / चंद्रदत्त ‘इंदु’

छोटी-सी बात पर / चंद्र कुमार जैन

सेचता हूँ लिखूं एक गीत किसी छोटी सी बात पर ! सुना है बड़ी-बड़ी बातों पर लिखे गये हैं बड़े-बड़े गीत परन्तु छोटी बात, क्या वास्तव में छोटी होती है ? खान-पान और मद्यपान पर क्यों लिखूँ मैं गीत, क्या यही है कलम के संसार की रीत? जब बिक रही हो जिंदगी रोटी के दो… Continue reading छोटी-सी बात पर / चंद्र कुमार जैन

आलोक का कहाँ डेरा है? / चंद्र कुमार जैन

आलोक से डरा-सहमा अंधेरा आखिर कहाँ जाकर करता बसेरा ? जानता था लीन हो जाएगा एक क्षण में इसलिए आकर बस गया वह आदमी के मन में अब आदमी के मन में अंधेरा है वह सोचता है आलोक का कहाँ डेरा है ?

आश्चर्य क्या है? / चंद्र कुमार जैन

एक क्षण के बाद दूसरा क्षण क्या है, हँसने के बाद रोना पड़े तो आश्चर्य क्या है ? कली जो खिल रही उद्यान की हर डाल पर, दूसरे क्षण टूटकर गिर जाए तो आ चर्य क्या है ? हाथों पर जिसको पाया और गोद में रखकर दुलराया, कांधों पर उसको ले जाना पड़ जाए तो… Continue reading आश्चर्य क्या है? / चंद्र कुमार जैन