कल माँ ने यह कहा –- कि उसकी शादी तय हो गई कहीं पर, मैं मुसकाया वहाँ मौन रो दिया किन्तु कमरे में आकर जैसे दो दुनिया हों मुझको मेरा कमरा औ’ मेरा घर ।
प्रेरणा के नाम / दुष्यंत कुमार
तुम्हें याद होगा प्रिय जब तुमने आँख का इशारा किया था तब मैंने हवाओं की बागडोर मोड़ी थीं, ख़ाक में मिलाया था पहाड़ों को, शीष पर बनाया था एक नया आसमान, जल के बहावों को मनचाही गति दी थी…., किंतु–वह प्रताप और पौरुष तुम्हारा था– मेरा तो नहीं था सिर्फ़! जैसे बिजली का स्विच दबे… Continue reading प्रेरणा के नाम / दुष्यंत कुमार
संधिस्थल / दुष्यंत कुमार
साँझ। दो दिशाओं से दो गाड़ियाँ आईं रुकीं। ‘यह कौन देखा कुछ झिझक संकोच से पर मौन। ‘तुमुल कोलाहल भरा यह संधिस्थल धन्य!’ दोनों एक दूजे के हृदय की धड़कनों को सुन रहे थे शांत, जैसे ऐंद्रजालिक-चेतना के लोक में उद्भ्रान्त। चल पड़ी फिर ट्रेन। मुख पर सद्यनिर्मित झुर्रियाँ स्पष्ट सी हो गईं दोनों और… Continue reading संधिस्थल / दुष्यंत कुमार
माया / दुष्यंत कुमार
दूध के कटोरे सा चाँद उग आया। बालकों सरीखा यह मन ललचाया। (आह री माया! इतना कहाँ है मेरे पास सरमाया? जीवन गँवाया!)
इनसे मिलिए / दुष्यंत कुमार
पाँवों से सिर तक जैसे एक जनून बेतरतीबी से बढ़े हुए नाख़ून कुछ टेढ़े-मेढ़े बैंगे दाग़िल पाँव जैसे कोई एटम से उजड़ा गाँव टखने ज्यों मिले हुए रक्खे हों बाँस पिण्डलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँस कुछ ऐसे लगते हैं घुटनों के जोड़ जैसे ऊबड़-खाबड़ राहों के मोड़ गट्टों-सी जंघाएँ निष्प्राण मलीन कटि, रीतिकाल की सुधियों… Continue reading इनसे मिलिए / दुष्यंत कुमार
पर जाने क्यों / दुष्यंत कुमार
माना इस बस्ती में धुआँ है खाई है, खंदक है, कुआँ है; पर जाने क्यों? कभी कभी धुआँ पीने को भी मन करता है; खाई-खंदकों में जीने को भी मन करता है; यह भी मन करता है— यहीं कहीं झर जाएँ, यहीं किसी भूखे को देह-दान कर जाएँ यहीं किसी नंगे को खाल खींच कर… Continue reading पर जाने क्यों / दुष्यंत कुमार
कागज़ की डोंगियाँ / दुष्यंत कुमार
यह समंदर है। यहाँ जल है बहुत गहरा। यहाँ हर एक का दम फूल आता है। यहाँ पर तैरने की चेष्टा भी व्यर्थ लगती है। हम जो स्वयं को तैराक कहते हैं, किनारों की परिधि से कब गए आगे? इसी इतिवृत्त में हम घूमते हैं, चूमते हैं पर कभी क्या छोर तट का? (किंतु यह… Continue reading कागज़ की डोंगियाँ / दुष्यंत कुमार
क्षमा / दुष्यंत कुमार
“आह! मेरा पाप-प्यासा तन किसी अनजान, अनचाहे, अकथ-से बंधनों में बँध गया चुपचाप मेरा प्यार पावन हो गया कितना अपावन आज! आह! मन की ग्लानि का यह धूम्र मेरी घुट रही आवाज़! कैसे पी सका विष से भरे वे घूँट…? जँगली फूल सी सुकुमार औ’ निष्पाप मेरी आत्मा पर बोझ बढ़ता जा रहा है प्राण!… Continue reading क्षमा / दुष्यंत कुमार
सत्य / दुष्यंत कुमार
दूर तक फैली हुई है जिंदगी की राह ये नहीं तो और कोई वृक्ष देगा छाँह गुलमुहर, इस साल खिल पाए नहीं तो क्या! सत्य, यदि तुम मुझे मिल पाए नहीं तो क्या!
पुनर्स्मरण / दुष्यंत कुमार
आह-सी धूल उड़ रही है आज चाह-सा काफ़िला खड़ा है कहीं और सामान सारा बेतरतीब दर्द-सा बिन-बँधे पड़ा है कहीं कष्ट-सा कुछ अटक गया होगा मन-सा राहें भटक गया होगा आज तारों तले बिचारे को काटनी ही पड़ेगी सारी रात x x x बात पर आ गई है बात स्वप्न थे तेरे प्यार के सब… Continue reading पुनर्स्मरण / दुष्यंत कुमार