सूर्य का स्वागत (कविता) / दुष्यंत कुमार

आँगन में काई है, दीवारें चिकनीं हैं, काली हैं, धूप से चढ़ा नहीं जाता है, ओ भाई सूरज! मैं क्या करूँ? मेरा नसीबा ही ऐसा है! खुली हुई खिड़की देखकर तुम तो चले आए, पर मैं अँधेरे का आदी, अकर्मण्य…निराश… तुम्हारे आने का खो चुका था विश्वास। पर तुम आए हो–स्वागत है! स्वागत!…घर की इन… Continue reading सूर्य का स्वागत (कविता) / दुष्यंत कुमार

नई पढ़ी का गीत / दुष्यंत कुमार

जो मरुस्थल आज अश्रु भिगो रहे हैं, भावना के बीज जिस पर बो रहे हैं, सिर्फ़ मृग-छलना नहीं वह चमचमाती रेत! क्या हुआ जो युग हमारे आगमन पर मौन? सूर्य की पहली किरन पहचानता है कौन? अर्थ कल लेंगे हमारे आज के संकेत। तुम न मानो शब्द कोई है न नामुमकिन कल उगेंगे चाँद-तारे, कल… Continue reading नई पढ़ी का गीत / दुष्यंत कुमार

सत्यान्वेषी / दुष्यंत कुमार

फेनिल आवर्त्तों के मध्य अजगरों से घिरा हुआ विष-बुझी फुंकारें सुनता-सहता, अगम, नीलवर्णी, इस जल के कालियादाह में दहता, सुनो, कृष्ण हूँ मैं, भूल से साथियों ने इधर फेंक दी थी जो गेंद उसे लेने आया हूँ [आया था आऊँगा] लेकर ही जाऊँगा।

उसे क्या कहूँ / दुष्यंत कुमार

किन्तु जो तिमिर-पान औ’ ज्योति-दान करता करता बह गया उसे क्या कहूँ कि वह सस्पन्द नहीं था ? और जो मन की मूक कराह ज़ख़्म की आह कठिन निर्वाह व्यक्त करता करता रह गया उसे क्या कहूँ गीत का छन्द नहीं था ? पगों कि संज्ञा में है गति का दृढ़ आभास, किन्तु जो कभी… Continue reading उसे क्या कहूँ / दुष्यंत कुमार

तीन दोस्त / दुष्यंत कुमार

सब बियाबान, सुनसान अँधेरी राहों में खंदकों खाइयों में रेगिस्तानों में, चीख कराहों में उजड़ी गलियों में थकी हुई सड़कों में, टूटी बाहों में हर गिर जाने की जगह बिखर जाने की आशंकाओं में लोहे की सख्त शिलाओं से दृढ़ औ’ गतिमय हम तीन दोस्त रोशनी जगाते हुए अँधेरी राहों पर संगीत बिछाते हुए उदास… Continue reading तीन दोस्त / दुष्यंत कुमार

सत्य बतलाना / दुष्यंत कुमार

सत्य बतलाना तुमने उन्हें क्यों नहीं रोका? क्यों नहीं बताई राह? क्या उनका किसी देशद्रोही से वादा था? क्या उनकी आँखों में घृणा का इरादा था? क्या उनके माथे पर द्वेष-भाव ज्यादा था? क्या उनमें कोई ऐसा था जो कायर हो? या उनके फटे वस्त्र तुमको भरमा गए? पाँवों की बिवाई से तुम धोखा खा… Continue reading सत्य बतलाना / दुष्यंत कुमार

अनुभव-दान / दुष्यंत कुमार

“खँडहरों सी भावशून्य आँखें नभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं। बीमार बच्चों से सपने उचाट हैं; टूटी हुई जिंदगी आँगन में दीवार से पीठ लगाए खड़ी है; कटी हुई पतंगों से हम सब छत की मुँडेरों पर पड़े हैं।” बस! बस!! बहुत सुन लिया है। नया नहीं है ये सब मैंने भी किया… Continue reading अनुभव-दान / दुष्यंत कुमार

आँधी और आग / दुष्यंत कुमार

अब तक ग्रह कुछ बिगड़े बिगड़े से थे इस मंगल तारे पर नई सुबह की नई रोशनी हावी होगी अँधियारे पर उलझ गया था कहीं हवा का आँचल अब जो छूट गया है एक परत से ज्यादा राख़ नहीं है युग के अंगारे पर।

समय / दुष्यंत कुमार

नहीं! अभी रहने दो! अभी यह पुकार मत उठाओ! नगर ऐसे नहीं हैं शून्य! शब्दहीन! भूला भटका कोई स्वर अब भी उठता है–आता है! निस्वन हवा में तैर जाता है! रोशनी भी है कहीं? मद्धिम सी लौ अभी बुझी नहीं, नभ में एक तारा टिमटिमाता है! अभी और सब्र करो! जल नहीं, रहने दो! अभी… Continue reading समय / दुष्यंत कुमार