Ada Jafri Archive

शायद अभी है राख में कोई शरार भी / ‘अदा’ ज़ाफ़री

शायद अभी है राख में कोई शरार भी क्यों वर्ना इन्तज़ार भी है इज़्तिरार भी ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी अब ढूँढने चले हो मुसाफ़िर को दोस्तो हद्द-ए-निगाह तक न …

शायद अभी है राख में कोई शरार भी / ‘अदा’ ज़ाफ़री

शायद अभी है राख में कोई शरार भी क्यों वर्ना इन्तज़ार भी है इज़्तिरार भी ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी अब ढूँढने चले हो मुसाफ़िर को दोस्तो हद्द-ए-निगाह तक न …

आख़िरी टीस आज़माने को / ‘अदा’ ज़ाफ़री

आख़िरी टीस आज़माने को जी तो चाहा था मुस्कुराने को याद इतनी भी सख़्तजाँ तो नहीं इक घरौंदा रहा है ढहाने को संगरेज़ों में ढल गये आँसू लोग हँसते रहे दिखाने को ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता है इक दिया …

न ग़ुबार में न गुलाब में मुझे देखना / ‘अदा’ ज़ाफ़री

न ग़ुबार में न गुलाब में मुझे देखना मेरे दर्द की आब-ओ-तब में मुझे देखना किसी वक़्त शाम मलाल में मुझे सोचना कभी अपने दिल की किताब में मुझे देखना किसी धुन में तुम भी जो बस्तियों को त्याग दो …

हर एक हर्फ़-ए-आरज़ू को दास्ताँ किये हुए / ‘अदा’ ज़ाफ़री

हर एक हर्फ़-ए-आरज़ू को दास्ताँ किये हुए ज़माना हो गया है उन को महमाँ किये हुए सुरूर-ए-ऐश तल्ख़ि-ए-हयात ने भुला दिया दिल-ए-हज़ीं है बेकसी को हिज्र-ए-जाँ किये हुए कली कली को गुलिस्ताँ किये हुए वो आयेंगे वो आयेंगे कली कली …

उजाला दे चराग़-ए-रह-गुज़र / ‘अदा’ ज़ाफ़री

उजाला दे चराग़-ए-रह-गुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था के आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते …

कोई संग-ए-रह भी चमक उठा / ‘अदा’ ज़ाफ़री

कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा मेरी रात भी तेरे नाम थी उसे किस ने तीरा-शबी कहा मेरे रोज़ ओ शब भी अजीब थे न शुमार था न हिसाब था कभी उम्र भर की ख़बर न थी कभी …

ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था / ‘अदा’ ज़ाफ़री

ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था दिल का आलम भी बे-मिसाल सा था अक्स मेरा भी आइनों में नहीं वो भी कैफ़ियत-ए-ख़याल सा था दश्त में सामने था ख़ेमा-ए-गुल दूरियों में अजब कमाल सा था बे-सबब तो नहीं था …

ख़लिश-ए-तीर-ए-बे-पनाह गई / ‘अदा’ ज़ाफ़री

ख़लिश-ए-तीर-ए-बे-पनाह गई लीजिए उन से रस्म-ओ-राह गई आप ही मरकज़-ए-निगाह रहे जाने को चार-सू निगाह गई सामने बे-नक़ाब बैठे हैं वक़्त-ए-हुस्न-ए-मेहर-ओ-माह गई उस ने नज़रें उठा के देख लिया इश्क़ की जुरअत-ए-निगाह गई इंतिहा-ए-जुनूँ मुबारक-बाद पुर्सिश-ए-हाल गाह गाह गई मर …