छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी। भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन यश है न वैभव है, मान है… Continue reading छाया मत छूना / गिरिजाकुमार माथुर
Author: poets
बरसों के बाद कभी / गिरिजाकुमार माथुर
बरसों के बाद कभी हम तुम यदि मिलें कहीं, देखें कुछ परिचित से, लेकिन पहिचानें ना। याद भी न आये नाम, रूप, रंग, काम, धाम, सोचें,यह सम्भव है – पर, मन में मानें ना। हो न याद, एक बार आया तूफान, ज्वार बंद, मिटे पृष्ठों को – पढ़ने की ठाने ना। बातें जो साथ हुई,… Continue reading बरसों के बाद कभी / गिरिजाकुमार माथुर
रितु ग्रीषम की प्रति बासर केशव, खेलत हैं जमुना-जल में / केशव.
रितु ग्रीषम की प्रति बासर ’केसब’ खेलत हैं जमुना जल में । इत गोप-सुता, उहिं पार गोपाल, बिराजत गोपन के गल में ॥ अति बूढ़ति हैं गति मीनन की, मिलि जाय उठें अपने थल में । इहिं भाँति मनोरथ पूरि दोउ जन, दूर रहैं छवि सों छल में ॥
पवन चक्र परचंड चलत, चहुँ ओर चपल गति / केशव.
पवन चक्र परचंड चलत, चहुँ ओर चपल गति । भवन भामिनी तजत, भ्रमत मानहुँ तिनकी मति ॥ संन्यासी इहि मास होत, एक आसन बासी । पुरुषन की को कहै, भए पच्छियौ निवासी ॥ इहि समय सेज सोबन लियौ, श्रीहिं साथ श्रीनाथ हू । कहि केसबदास असाढ़ चल, मैं न सुन्यौ श्रुति गाथ हू ॥
जौँ हौँ कहौँ रहिये तो प्रभुता प्रगट होत / केशव.
जौँ हौँ कहौँ रहिये तो प्रभुता प्रगट होत, चलन कहौँ तौ हित हानि नाहीँ सहनो। भावै सो करहु तौ उदास भाव प्राण नाथ, साथ लै चलहु कैसो लोक लाज बहनो। केशोदास की सोँ तुम सुनहु छबीले लाल, चले ही बनत जो पै नाहीँ राज रहनो। जैसिये सिखाओ सीख तुम ही सुजान प्रिय, तुमहिँ चलत मोहि… Continue reading जौँ हौँ कहौँ रहिये तो प्रभुता प्रगट होत / केशव.
मैन ऎसो मन मृदु मृदुल मृणालिका के / केशव.
मैन ऎसो मन मृदु मृदुल मृणालिका के, सूत कैसो सुर ध्वनि मननि हरति है। दारयोँ कैसो बीज दाँत पाँत से अरुण ओँठ, केशोदास देखि दृग आनँद भरति है। येरी मेरी तेरी मोँहिँ भावत भलाई तातेँ, बूझति हौँ तोहिँ और बूझति डरति है। माखन सी जीभ मुख कँज सी कोमलता मे, काठ सी कठेठी बात कैसे… Continue reading मैन ऎसो मन मृदु मृदुल मृणालिका के / केशव.
सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै / केशव.
सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै । केशव दास मनोज मनोहर ताहि फले फल श्री फल से द्वै । फूलि सरोज रह्यो तिन ऊपर रूप निरूपन चित्त चले चवै । तापर एक सुवा शुभ तापर खेलत बालक खंञन के द्वै । केशव का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा… Continue reading सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै / केशव.
कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक पर / केशव.
कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक परै , कैधौं कीर कमल मे दाड़िम दुराए हैँ । कैधौँ मुकताहल महावर मे राखे रँगि , कैधौं मणि मुकुर मे सीकर सुहाए हैँ । कैधौं सातौँ मंडल के मंडल मयंक मध्य , बीजुरी के बीज सुधा सींचि कै उराए हैँ । केसौदास प्यारी के बदन में रदन… Continue reading कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक पर / केशव.
नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै / केशव.
नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै, मुरली ज्योँ लाय राखौं दसन बसन मैं। राखौ भुज बीच बनमाली बनमाला करि, चंदन ज्योँ चतुर चढ़ाय राखौं तन मैँ। केसोराय कल कंठ राखौ बलि कठुला कै, भरमि भरमि क्यों हूँ आनी है भवन मैँ। चंपक कली सी बाल सूँघि सूँघि देवता सी, लेहु प्यारे लाल इन्हेँ… Continue reading नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै / केशव.
दुरिहै क्यों भूखन बसन दुति जोबन की / केशव.
दुरिहै क्यों भूखन बसन दुति जोबन की , देहहु की जोति होति द्यौस ऎसी राति है । नाहक सुबास लागे ह्वै कैसी केशव , सुभावती की बास भौंर भीर फारे खाति है । देखि तेरी सूरति की मूरति बिसूरति हूँ , लालन के दृग देखिबे को ललचाति है । चालिहै क्यों चँदमुखी कुचन के भार… Continue reading दुरिहै क्यों भूखन बसन दुति जोबन की / केशव.