पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो । सीठी तमूर खवाइबो खैबो विशेष चहूँ दिशि चौँकि चितैबो । चीर कुचीलन ऊपर पौढ़िबो पातहु के खरके भगि ऎबो । आँखिन मूँद के सीखत राधिका कुँजन ते प्रति कुँजन जैबो । केशव.का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
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एक भूत में होत, भूत भज पंचभूत भ्रम / केशव
एक भूत में होत, भूत भज पंचभूत भ्रम । अनिल-अंबु-आकास, अवनि ह्वै जाति आगि सम ॥ पंथ थकित मद मुकित, सुखित सर सिंधुर जोवत । काकोदर करि कोस, उदरतर केहरि सोवत ॥ पिय प्रबल जीव इहि विधि अबल, सकल विकल जलथल रहत । तजि ’केसवदास’ उदास मग, जेठ मास जेठहिं कहत ॥
लंदन में बिक आया नेता / केदारनाथ अग्रवाल
लंदन में बिक आया नेता, हाथ कटा कर आया । एटली-बेविन-अंग्रेज़ों में, खोया और बिलाया ।। भारत-माँ का पूत-सिपाही, पर घर में भरमाया । अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का, उसने डिनर उड़ाया ।। अर्थनीति में राजनीति में, गहरा गोता खाया । जनवादी भारत का उसने, सब-कुछ वहाँ गवायाँ ।| गोटवव
कंकरीला मैदान / केदारनाथ अग्रवाल
कंकरीला मैदान ज्ञान की तरह जठर-जड़ लम्बा चौड़ा गत वैभव की विकल याद में- बडी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया। जहाँ-तहाँ कुछ कुछ दूरी पर, उसके उँपर, पतले से पतले डंठल के नाजुक बिरवे थर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए बेहद पीड़ित। हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है अनुपम, मनोहर,… Continue reading कंकरीला मैदान / केदारनाथ अग्रवाल
मैना / केदारनाथ अग्रवाल
गुम्बज के ऊपर बैठी है, कौंसिल घर की मैना । सुंदर सुख की मधुर धूप है, सेंक रही है डैना ।। तापस वेश नहीं है उसका, वह है अब महारानी । त्याग-तपस्या का फल पाकर, जी में बहुत अघानी ।। कहता है केदार सुनो जी ! मैना है निर्द्वंद्व । सत्य-अहिंसा आदर्शों के, गाती है… Continue reading मैना / केदारनाथ अग्रवाल
जीवन से / केदारनाथ अग्रवाल
ऐसे आओ जैसे गिरि के श्रृंग शीश पर रंग रूप का क्रीट लगाये बादल आये, हंस माल माला लहराये और शिला तन- कांति-निकेतन तन बन जाये। तब मेरा मन तुम्हें प्राप्त कर स्वयं तुम्हारी आकांक्षा का बन जायेगा छवि सागर, जिसके तट पर, शंख-सीप-लहरों के मणिधर आयेंगे खेलेंगे मनहर, और हँसेगा दिव्य दिवाकर।
हम और सड़कें / केदारनाथ अग्रवाल
सूर्यास्त मे समा गयीं सूर्योदय की सड़कें, जिन पर चलें हम तमाम दिन सिर और सीना ताने, महाकाश को भी वशवर्ती बनाने, भूमि का दायित्व उत्क्रांति से निभाने, और हम अब रात मे समा गये, स्वप्न की देख-रेख में सुबह की खोयी सड़कों का जी-जान से पता लगाने
ओस की बूंद कहती है / केदारनाथ अग्रवाल
ओस-बूंद कहती है; लिख दूं नव-गुलाब पर मन की बात। कवि कहता है : मैं भी लिख दूं प्रिय शब्दों में मन की बात॥ ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ नव-गुलाब हो गया मलीन। पर कवि ने लिख दिया ओस से नव-गुलाब पर काव्य नवीन॥
आज नदी बिलकुल उदास थी / केदारनाथ अग्रवाल
आज नदी बिलकुल उदास थी। सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर- बादल का वस्त्र पडा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।
वीरांगना / केदारनाथ अग्रवाल
मैंने उसको जब-जब देखा लोहा देखा लोहे जैसा- तपते देखा- गलते देखा- ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।