अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर वक़्त से पहले डूब गए तारों ने… Continue reading अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की / क़तील
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग / क़तील
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं… Continue reading जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग / क़तील
मुझे आई ना जग से लाज / क़तील
मुझे आई ना जग से लाज मैं इतना ज़ोर से नाची आज, के घुंघरू टूट गए कुछ मुझ पे नया जोबन भी था कुछ प्यार का पागलपन भी था कभी पलक पलक मेरी तीर बनी एक जुल्फ मेरी ज़ंजीर बनी लिया दिल साजन का जीत वो छेड़े पायलिया ने गीत, के घुंघरू टूट गए मैं… Continue reading मुझे आई ना जग से लाज / क़तील
हाथ दिया उसने मेरे हाथ में / क़तील
हाथ दिया उसने मेरे हाथ में। मैं तो वली बन गया एक रात मे॥ इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम तोहमतें बटती नहीं खैरात में॥ इश्क़ बुरी शै सही, पर दोस्तो। दख्ल न दो तुम, मेरी हर बात में॥ हाथ में कागज़ की लिए छतरियाँ घर से ना निकला करो बरसात में॥ रत बढ़ाया उसने न… Continue reading हाथ दिया उसने मेरे हाथ में / क़तील
आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए / क़तील
आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए फिर से किसी वाईज़ को परेशान किया जाए॥ बे-लर्जिश-ए-पा मस्त हो उन आँखो से पी कर यूँ मोह-त-सीबे शहर को हैरान किया जाए॥ हर शह से मुक्क्दस है खयालात का रिश्ता क्यूँ मस्लिहतो पर इसे कुर्बान किया जाए॥ मुफलिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत अब… Continue reading आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए / क़तील
बशर के रूप में एक दिलरूबा तलिस्म बनें / क़तील
बशर के रूप में एक दिलरूबा तलिस्म बनें शफफ धूप मिलाए तो उसका ज़िस्म बने॥ वो मगदाद की हद तक पहुँच गया ‘कतील’ रूप कोई भी लिखूँ उसी का ज़िस्म लगे॥ वो शक्स कि मैं जिसे मुहब्बत नहीं करता हँसता है मुझे देख कर नफरत नहीं करता॥ पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे तार से… Continue reading बशर के रूप में एक दिलरूबा तलिस्म बनें / क़तील
गम के सहराओ में / क़तील
गम के सहराओ में घंघोर घटा सा भी था वो दिलावर जो कई रोज़ का प्यासा भी था॥ ज़िन्दगी उसने ख़रीदी न उसूलो के एवज़ क्योकि वो शक्स मुहम्मद का निवासा भी था॥ अपने ज़ख्मो का हमें बक्श रहा था वो सवाब उसकी हर आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था॥ सिर्फ तीरो ही कि आती… Continue reading गम के सहराओ में / क़तील
सारी बस्ती में ये जादू / क़तील
सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको॥ सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया मैं एक हसीन शक्स की बातों में आ गया॥ जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए॥ गुस्ताख हवाओं की शिकायत न… Continue reading सारी बस्ती में ये जादू / क़तील
एवंकार बीअ लहइ कुसुमिअउ अरविंदए / कण्हपा
एवंकार बीअ लहइ कुसुमिअउ अरविंदए। महुअर रुएँ सुरत्प्रवीर जिंघइ म अरंदए॥ जिमि लोण बिलज्जइ पणिएहि तिमि घरणी लइ चित्त। समरस जाइ तक्खणो जइ पुणु ते सम चित्त॥ (सहस्रार कमल में महामुद्रा धारण कर सुरतवीर (योगी) उसी प्रकार आनंद का अनुभव करता है जैसे भौंरा पराग को सूँघता है। यदि साधक समरसता प्राप्त करना चाहता है… Continue reading एवंकार बीअ लहइ कुसुमिअउ अरविंदए / कण्हपा
मुक्ति-संग्राम अभी जारी है / कंवल भारती
मैं उस अतीत को अपने बहुत क़रीब पाता हूँ जिसे जिया था तुमने अपने दृढ-संकल्प और संघर्ष से। परिवर्तित किया था समय-चक्र को इस वर्तमान में। मैं उस अन्धी निशा की भयानक पीड़ा को / जब भी महसूस करता हूँ तुम्हारे विचारों के आन्दोलन में मुखर होता है एक रचनात्मक विप्लव मेरे रोम-रोम में। तुम… Continue reading मुक्ति-संग्राम अभी जारी है / कंवल भारती