रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे / ख़ालिद कर्रार

रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे उतार अब के सर-ए-आसमाँ उतार मुझे मेरा वजूद समंदर के इजि़्तराब में है के खुल रहा है तेरा बाद-बाँ उतार मुझे बहुत अज़ीज़ हूँ ख़ारान-ए-ताज़ा-कार को मैं बहुत उदास है दश्त-ए-जवाँ उतार मुझे कोई जज़ीरा जहाँ हस्त ओ बूद हो न फ़ना वजूद हो न ज़माना वहाँ… Continue reading रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे / ख़ालिद कर्रार

किसी के ख़्वाब को एहसास से बाँधा हुआ है / ख़ालिद कर्रार

किसी के ख़्वाब को एहसास से बाँधा हुआ है बहुत पुख़्ता बहुत ही पास से बाँधा हुआ है हमारे तख़्त को मशरूत कर रखा है उस ने हमारे ताज को बन-बास से बाँधा हुआ है सियाही उम्र भर मेरे तआकुब में रहेगी के मैं ने जिस्म को क़िरतास से बाँधा हुआ है मेरे इसबात की… Continue reading किसी के ख़्वाब को एहसास से बाँधा हुआ है / ख़ालिद कर्रार

इम्कान से बाहर अभी आसार से आगे / ख़ालिद कर्रार

इम्कान से बाहर अभी आसार से आगे महशर है मेरे दीदा-ए-ख़ूँ-बार से आगे इरफ़ान की हद या मेरे पैकर की शरारत निकला मेरा साया मेरी दस्तार से आगे इक ज़िंस-ज़दा नस्ल है तहज़ीब के पीछे बाज़ार है इक कूचा ओ बाज़ार से आगे सूरज है शब ओ रोज़ तआक़ुब में वगरना है और बहुत रात… Continue reading इम्कान से बाहर अभी आसार से आगे / ख़ालिद कर्रार

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे / ख़ालिद कर्रार

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे वो एक कार-ए-फ़ना-ज़ार में है साथ मेरे सलीब-ए-जाँ से विसाल आसमाँ के साहिल तक हर एक लज़्ज़त-आज़ार में है साथ मेरे कभी तो हीरो बनाता है और कभी जोकर हर एक रंग के किरदार में है साथ मेरे यही बहुत है मेरे जिस्म ओ जाँ का हिस्सा… Continue reading है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे / ख़ालिद कर्रार

धुआँ शोरिश रवानी बे-यक़ीनी / ख़ालिद कर्रार

धुआँ शोरिश रवानी बे-यक़ीनी हवा रफ़्तार पानी बे-यक़ीनी ख़ला इंसान वहशत ख़ाक हिजरत मकाँ रस्ते निशानी बे-यक़ीनी अज़ल बाबील रावी ख़ून आदम अब क़ाबील सानी बे-यक़ीनी अज़ल ख़ाली ख़ला अंजाम आख़िर अबद आबाद फ़ानी बे-यक़ीनी बदन आगोश रस्ता काम गंदुम दवा बच्चे जवानी बे-यक़ीनी फ़ज़ा रौशन अँधेरा जश्न गलियाँ ख़ुशी मातम कहानी बे-यक़ीनी मसाजिद शंख… Continue reading धुआँ शोरिश रवानी बे-यक़ीनी / ख़ालिद कर्रार

बला की प्यास भी हद्द-ए-नज़र में पानी था / ख़ालिद कर्रार

बला की प्यास भी हद्द-ए-नज़र में पानी था के आज ख़्वाम में सहरा था घर में पानी था फिर इस बे बाद मेरी रात बे-मिसाल हुई उधर वो शोला-बदन था इधर मैं पानी था न जाने ख़ाक के मिज़गाँ पे आबशर था क्या मेरा कुसूर था मेरे शरर में पानी था तमाम उम्र ये उक़दा… Continue reading बला की प्यास भी हद्द-ए-नज़र में पानी था / ख़ालिद कर्रार

बात ये है के कोई बात पुरानी भी नहीं / ख़ालिद कर्रार

बात ये है के कोई बात पुरानी भी नहीं और इस ख़ाक में अब कोई निशानी भी नहीं ये तो ज़ाहिर में तमव्वुज था बला का लेकिन या बदन मेरा जहाँ कोई रवानी भी नहीं या तो इक मौज-ए-बला-ख़ेज है मेरी ख़ातिर या के मश्कीज़ा-ए-जाँ में कहीं पानी भी नहीं बात ये है के सभी… Continue reading बात ये है के कोई बात पुरानी भी नहीं / ख़ालिद कर्रार

सात परवाने की उल्फ़त सती रोते रोते / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

सात परवाने की उल्फ़त सती रोते रोते शम्अ ने जान दिया सुब्ह के होते होते दाग़ छूटा नहीं ये किस का लहू है क़ातिल हाथ भी दुख गए दामन तिरा धोते धोते किस परी-रू से हुई रात मिरी चश्म दो चार कि मैं दीवाना उठा ख़्वाब से रोते रोते ग़ैर लूटे हैं समन मुफ़्त तिरे… Continue reading सात परवाने की उल्फ़त सती रोते रोते / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

फलक ने रंज तीर आह से मेरे ज़ि-बस खेंचा / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

फलक ने रंज तीर आह से मेरे ज़ि-बस खेंचा लबों तक दिल से शब नाले को मैं ने नीम रस खेंचा मिरे शोख़-ए-ख़राबाती की कैफ़िय्यत न कुछ पूछो बहार-ए-हुस्न को दी आब उस ने जब चरस खेंचा रहा जोश-ए-बहार इस फ़स्लगर यूँही तो बुलबुल ने चमन में दस्त-ए-गुल-चीं से अजब रंग उस बरस खेंचा कहा… Continue reading फलक ने रंज तीर आह से मेरे ज़ि-बस खेंचा / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

आता है सुब्ह उठ कर तेरी बराबरी को / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली

आता है सुब्ह उठ कर तेरी बराबरी को क्या दिन लगे हैं देखो ख़ुर्शीद-ए-ख़ावरी को दिल मारने का नुस्ख़ा पहुँचा है आशिक़ों तक क्या कोई जानता है इस कीमिया-गरी को उस तुंद-ख़ू सनम से मिलने लगा हूँ जब से हर कोई जानता है मेरी दिलावरी को अपनी फ़ुसूँ-गरी से अब हम तो हार बैठे बाद-ए-सबा… Continue reading आता है सुब्ह उठ कर तेरी बराबरी को / ख़ान-ए-आरज़ू सिराजुद्दीन अली