भूमिका / साये में धूप / दुष्यंत कुमार

मैं स्वीकार करता हूँ… —कि ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है. कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है .उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है. —कि मैं उर्दू नहीं जानता,… Continue reading भूमिका / साये में धूप / दुष्यंत कुमार

आवाज़ों के घेरे (कविता) / दुष्यन्त कुमार

आवाज़ें… स्थूल रूप धरकर जो गलियों, सड़कों में मँडलाती हैं, क़ीमती कपड़ों के जिस्मों से टकराती हैं, मोटरों के आगे बिछ जाती हैं, दूकानों को देखती ललचाती हैं, प्रश्न चिह्न बनकर अनायास आगे आ जाती हैं- आवाज़ें ! आवाज़ें, आवाज़ें !! मित्रों ! मेरे व्यक्तित्व और मुझ-जैसे अनगिन व्यक्तित्वों का क्या मतलब ? मैं जो… Continue reading आवाज़ों के घेरे (कविता) / दुष्यन्त कुमार

कौन-सा पथ / दुष्यन्त कुमार

तुम्हारे आभार की लिपि में प्रकाशित हर डगर के प्रश्न हैं मेरे लिए पठनीय कौन-सा पथ कठिन है…? मुझको बताओ मैं चलूँगा। कौन-सा सुनसान तुमको कोचता है कहो, बढ़कर उसे पी लूँ या अधर पर शंख-सा रख फूँक दूँ तुम्हारे विश्वास का जय-घोष मेरे साहसिक स्वर में मुखर है। तुम्हारा चुम्बन अभी भी जल रहा… Continue reading कौन-सा पथ / दुष्यन्त कुमार

एक यात्रा-संस्मरण / दुष्यन्त कुमार

बढ़ती ही गयी ट्रेन महाशून्य में अक्षत यात्री मैं लक्ष्यहीन यात्री मैं संज्ञाहत। छूटते गये पीछे गाँवों पर गाँव और नगरों पर नगर बाग़ों पर बाग़ और फूलों के ढेर हरे-भरे खेत औ’ तड़ाग पीले मैदान सभी छूटते गये पीछे… लगता था कट जायेगा अब यह सारा पथ बस यों ही खड़े-खड़े डिब्बे के दरवाज़े… Continue reading एक यात्रा-संस्मरण / दुष्यन्त कुमार

अनुकूल वातावरण / दुष्यन्त कुमार

उड़ते हुए गगन में परिन्दों का शोर दर्रों में, घाटियों में ज़मीन पर हर ओर… एक नन्हा-सा गीत आओ इस शोरोगुल में हम-तुम बुनें, और फेंक दें हवा में उसको ताकि सब सुने, और शान्त हों हृदय वे जो उफनते हैं और लोग सोचें अपने मन में विचारें ऐसे भी वातावरण में गीत बनते हैं।

साँसों की परिधि / दुष्यन्त कुमार

जैसे अन्धकार में एक दीपक की लौ और उसके वृत्त में करवट बदलता-सा पीला अँधेरा। वैसे ही तुम्हारी गोल बाँहों के दायरे में मुस्करा उठता है दुनिया में सबसे उदास जीवन मेरा। अक्सर सोचा करता हूँ इतनी ही क्यों न हुई आयु की परिधि और साँसों का घेरा।

सूखे फूल : उदास चिराग़ / दुष्यन्त कुमार

आज लौटते घर दफ़्तर से पथ में कब्रिस्तान दिखा फूल जहाँ सूखे बिखरे थे और’ चिराग़ टूटे-फूटे यों ही उत्सुकता से मैंने थोड़े फूल बटोर लिये कौतूहलवश एक चिराग़ उठाया औ’ संग ले आया थोड़ा-सा जी दुखा, कि देखो, कितने प्यारे थे ये फूल कितनी भीनी, कितनी प्यारी होगी इनकी गन्ध कभी, सोचा, ये चिराग़… Continue reading सूखे फूल : उदास चिराग़ / दुष्यन्त कुमार

आग जलती रहे / दुष्यन्त कुमार

एक तीखी आँच ने इस जन्म का हर पल छुआ, आता हुआ दिन छुआ हाथों से गुज़रता कल छुआ हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा, फूल-पत्ती, फल छुआ जो मुझे छूने चली हर उस हवा का आँचल छुआ ! …प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता आग के सम्पर्क से दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में मैं… Continue reading आग जलती रहे / दुष्यन्त कुमार

दृष्टान्त / दुष्यन्त कुमार

वह चक्रव्यूह भी बिखर गया जिसमें घिरकर अभिमन्यु समझता था ख़ुद को। आक्रामक सारे चले गये आक्रमण कहीं से नहीं हुआ बस मैं ही दुर्निवार तम की चादर-जैसा अपने निष्क्रिय जीवन के ऊपर फैला हूँ। बस मैं ही एकाकी इस युद्ध-स्थल के बीच खड़ा हूँ। यह अभिमन्यु न बन पाने का क्लेश ! यह उससे… Continue reading दृष्टान्त / दुष्यन्त कुमार

आज / दुष्यन्त कुमार

अक्षरों के इस निविड़ वन में भटकतीं ये हजारों लेखनी इतिहास का पथ खोजती हैं …क्रान्ति !…कितना हँसो चाहे किन्तु ये जन सभी पागल नहीं। रास्तों पर खड़े हैं पीड़ा भरी अनुगूँज सुनते शीश धुनते विफलता की चीख़ पर जो कान स्वर-लय खोजते हैं ये सभी आदेश-बाधित नहीं। इस विफल वातावरण में जो कि लगता… Continue reading आज / दुष्यन्त कुमार