ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगो / दुष्यंत कुमार

ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगो कि जैसे जल में झलकता हुआ महल, लोगो दरख़्त हैं तो परिन्दे नज़र नहीं आते जो मुस्तहक़ हैं वही हक़ से बेदख़ल, लोगो वो घर में मेज़ पे कोहनी टिकाये बैठी है थमी हुई है वहीं उम्र आजकल ,लोगो किसी भी क़ौम की तारीख़ के उजाले में… Continue reading ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगो / दुष्यंत कुमार

भूख है तो सब्र कर / दुष्यंत कुमार

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ । मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ । गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ । क्या वज़ह है प्यास… Continue reading भूख है तो सब्र कर / दुष्यंत कुमार

अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूँ / दुष्यंत कुमार

अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूँ तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ये दरवाज़ा खोलें तो खुलता नहीं है इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ अँधेरे में कुछ ज़िन्दगी होम कर दी उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं जिन्हें रात-दिन स्मरण कर… Continue reading अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूँ / दुष्यंत कुमार

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं / दुष्यंत कुमार

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं हवा में सनसनी घोले हुए हैं तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो क़ुरान—ओ—उपनिषद् खोले हुए हैं मज़ारों से दुआएँ माँगते हो अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं हमारे हाथ तो काटे गए थे हमारे… Continue reading परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं / दुष्यंत कुमार

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही / दुष्यंत कुमार

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा या यूँ… Continue reading खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही / दुष्यंत कुमार

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली / दुष्यंत कुमार

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली ये ख़तरनाक सचाई नहीं जाने वाली कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली चीख़ निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है बंद… Continue reading देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली / दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है / दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है एक चादर साँझ ने… Continue reading इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है / दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा / दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा[1] मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते वो सब के सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ… Continue reading ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा / दुष्यंत कुमार

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं / दुष्यंत कुमार

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं मछलियों में खलबली है अब… Continue reading कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं / दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए / दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए ख़ुदा नहीं न… Continue reading कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए / दुष्यंत कुमार