Ritu Pallavi Archive

नए हाइकु / ऋतु पल्लवी

1- नभ में पंछी सागर – तन मीन कहाँ बसूँ मैं ? 2- कितना लूटा धन संपदा यश घर न मिला . 3-चंदन -साँझ रच बस गयी है मन खाली था. 4-स्याही से मत लिखो ,रचनाओं को मन उकेरो . 5-बच्चे …

औरत / ऋतु पल्लवी

पेचीदा, उलझी हुई राहों का सफ़र है कहीं बेवज़ह सहारा तो कहीं खौफ़नाक अकेलापन है कभी सख्त रूढि़यों की दीवार से बाहर की लड़ाई है… ..तो कभी घर की ही छत तले अस्तित्व की खोज है समझौतों की बुनियाद पर …

आप अपना… / ऋतु पल्लवी

आज मैंने आप अपना आईने में रख दिया है और आईने की सतह को पुरज़ोर स्वयं से ढक दिया है। कुछ पुराने हर्फ– दो-चार पन्ने जिन्हें मैंने रात की कालिख बुझाकर कभी लिखा था नयी आतिश जलाकर आज उनकी आतिशी …

वेश्या / ऋतु पल्लवी

मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को अपवित्र होने से बचाती हूँ। सारे बनैले-खूंखार भावों को भरती हूँ कोमलतम भावनाओं को पुख्ता करती हूँ। मानव के भीतर की उस गाँठ को खोलती हूँ जो इस …

जीने भी दो / ऋतु पल्लवी

महानगर में ऊँचे पद की नौकरी अच्छा-सा जीवन साथी और हवादार घर यही रूपरेखा है- युवा वर्ग की समस्याओं का और यही निदान भी। इस समस्या को कभी आप तितली, फूल और गंध से जोड़ते हैं, रूमानी खाका खींचते हैं, …

याद / ऋतु पल्लवी

शांत-प्रशांत समुद्र के अतल से उद्वेलित एक उत्ताल लहर वेगवती उमड़ती किसी नदी को समेट कर शांत करता सागर। किसी घोर निविड़तम से वनपाखी का आह्वान प्रथम प्यास में ही चातक को जैसे स्वाति का संधान। अंध अतीत की श्रंखला …

अकेलापन / ऋतु पल्लवी

एक दिन जब बहुत अलसाने के बाद आँखे खोलीं, खिड़की से झरते हल्के प्रकाश को बुझ जाते देखा एक छोटे बच्चे से नन्हे सूरज को आते-जाते देखा नीचे झाँककर देखा हँसते–खिलखिलाते, लड़ते-झगड़ते पड़ोस के बच्चे प्रातः के बोझ को ढोते …

घर / ऋतु पल्लवी

भीड़ भरी सड़कों की चीख़ती आवाज़ें अक्सर खींचती हैं मुझे.. और घर के सन्नाटे से घबराकर, में उस ओर बढ़ जाती हँ …ठिठक-ठिठक कर क़दम बढाती हूँ। भय है मुझे उन विशालकाय खुले रास्तों से कि जहाँ से कोई रास्ता …

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना / ऋतु पल्लवी

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है. पावस के पीले पत्तों को स्वर्ण रंग दे हार बना निज स्वप्न वर्ण दे वासंती सा मोह जगाना,मन को भाता है. कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है . व्यर्थ जूही-दल,मिथ्य …

क्यों नहीं / ऋतु पल्लवी

नीला आकाश ,सुनहरी धूप ,हरे खेत पीले पत्ते ही क्यों उपमान बनते हैं ! कभी बेरंग रेगिस्तान में क्यों गुलाबी फूलों की बात नहीं होती ? रूप की रोशनी ,तारों की रिमझिम, फूलों की शबनमी को ही क्यों सराहते हैं लोग! कभी …