Bhawani Prasad Mishra Archive

संगाती / भवानीप्रसाद मिश्र

नहीं रामचरण नहीं था न मदन था न रामस्वरूप कोई और था उस दिन मेरे साथ जिसने सतपुड़ा के जंगलों में भूख की शिकायत की न प्यास की जिसने न छाँह ताकी न पूछा कितना बाक़ी है अभी ठहरने का …

पीताभ किरन-पंछी / भवानीप्रसाद मिश्र

दूसरे सारे पंछी अपने सारे गीत गा चुके हैं रक्त और नील सारे फूल मेरे आँगन में आ चुके हैं सुनाई नहीं दी एक तुम्हारी ही बोली ओ पीताभ किरण पंछी ओ ठीक कविता की सहोदरा फूल और गीत और …

क्यों टेरा / भवानीप्रसाद मिश्र

मेरा लहरों पर डेरा तुमने तट से मुझे धरती पर क्यों टेरा दो मुझे अब मुझे वहाँ भी वैसी उथल-पुथल की ज़िन्दगी आदत जो हो गई है डूबने उतराने की तूफ़ानों में गाने की लाओ धरो मेरे सामने वैसी उथल-पुथल …

चुपचाप उल्लास / भवानीप्रसाद मिश्र

हम रात देर तक बात करते रहे जैसे दोस्त बहुत दिनों के बाद मिलने पर करते हैं और झरते हैं जैसे उनके आस पास उनके पुराने गाँव के स्वर और स्पर्श और गंध और अंधियारे फिर बैठे रहे देर तक …

कला-2 / भवानीप्रसाद मिश्र

कोई अलौकिक ही कला हो किसी के पास तो अलग बात है नहीं तो साधारणतया कलाकार को तो लौकिक का ही सहारा है लौकिक के सहारे लोकोपयोगी रचना ही करनी है और ऐसा करते-करते जितनी अलौकिकता आ जाए उतनी अपने …