Bhawani Prasad Mishra Archive

देखो कि / भवानीप्रसाद मिश्र

रात को दिन को अकेले में और मेले में तुम गुनगुनाते रहना क्योंकि देखो गुनगुना रही हैं वहाँ मधुमक्खियाँ नीम के फूलों को चूसते हुए और महक रहे हैं नीम के फूल ज़्यादा-ज़्यादा देकर मधुमक्खियों को रस !

आँखें बोलेंगी / भवानीप्रसाद मिश्र

जीभ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कहकर या बोलकर मन की बातें ज़ाहिर करने की सूरत नहीं है हम बोलेंगे नहीं अब घूमेंगे-भर खुले में लोग आँखें देखेंगे हमारी आँखें हमारी बोलेंगी बेचैनी घोलेंगी हमारी आँखें वातावरण में जैसे प्रकृति …

गीत-आघात / भवानीप्रसाद मिश्र

तोड़ रहे हैं सुबह की ठंडी हवा को फूट रही सूरज की किरनें और नन्हें-नन्हें पंछियों के गीत मज़दूरों की काम पर निकली टोलियों को किरनों से भी ज़्यादा सहारा गीतों का है शायद नहीं तो कैसे निकलते वे इतनी …

अधूरे ही / भवानीप्रसाद मिश्र

अधूरे मन से ही सही मगर उसने तुझसे मन की बात कही पुराने दिनों के अपने अधूरे सपने तेरे क़दमों में ला रखे उसने तो तू भी सींच दे उसके तप्त शिर को अपने आंसुओं से डाल दे उस पर …

शून्य होकर / भवानीप्रसाद मिश्र

शून्य होकर बैठ जाता है जैसे उदास बच्चा उस दिन उतना अकेला और असहाय बैठा दिखा शाम का पहला तारा काफ़ी देर तक नहीं आये दूसरे तारे और जब आये तब भी ऐसा नहीं लगा पहले ने उन्हें महसूस किया …

काफ़ी दिन हो गये / भवानीप्रसाद मिश्र

काफ़ी दिन हो गये लगभग छै साल कहो तब से एक कोशिश कर रहा हूँ मगर होता कुछ नहीं है काम शायद कठिन है मौत का चित्र खींचना मैंने उसे सख्त ठण्ड की एक रात में देखा था नंग–धडंग नायलान …

क्या हर्ज़ है / भवानीप्रसाद मिश्र

क्या हर्ज़ है अगर अब विदा ले लें हम एक सपने से जो तुमने भी देखा था और मैंने भी दोनों के सपने में कोई भी फ़र्क नहीं था ऐसा तो नहीं कहूँगा फ़र्क था मगर तफ़सील -भर का मूलतः …

अपने आपमें / भवानीप्रसाद मिश्र

अपने आप में एक ओछी चीज़ है समय चीजों को टोड़ने वाला मिटाने वाला बने- बनाये महलों मकानों देशों मौसमों और ख़यालों को मगर आज सुबह से पकड़ लिये हैं मैंने इस ओछे आदमी के कान और वह मुझे बेमन …

सागर से मिलकर / भवानीप्रसाद मिश्र

सागर से मिलकर जैसे नदी खारी हो जाती है तबीयत वैसे ही भारी हो जाती है मेरी सम्पन्नों से मिलकर व्यक्ति से मिलने का अनुभव नहीं होता ऐसा नहीं लगता धारा से धारा जुड़ी है एक सुगंध दूसरी सुगंध की …