Bhawani Prasad Mishra Archive

बहुत छोटी जगह / भवानीप्रसाद मिश्र

बहुत छोटी जगह है घर जिसमें इन दिनों इजाज़त है मुझे चलने फिरने की फिर भी बड़ी गुंजाइश है इसमें तूफानों के घिरने की कभी बच्चे लड़ पड़ते हैं कभी खड़क उठते हैं गुस्से से उठाये-धरे जाने वाले बर्तन घर …

मुझे अफ़सोस है / भवानीप्रसाद मिश्र

मुझे अफ़सोस है या कहिए मुझे वह है जिसे मैं अफ़सोस मानता रहा हूँ क्योंकि ज़्यादातर लोगों को ऐसे में नहीं होता वह जिसे मैं अफ़सोस मानता रहा हूँ मेरा मन आज शाम को शहर के बाहर जाकर और बैठकर …

तुम भीतर / भवानीप्रसाद मिश्र

तुम भीतर जो साधे हो और समेटे हों कविता नहीं बनेगी वह क्योंकि कविता तो बाहर है तुम्हारे अपने भीतर को बाहर से जोड़ोगे नहीं बाहर जिस-जिस तरफ़ जहाँ -जहाँ जा रहा है अपने भीतर को उस-उस तरफ़ वहाँ -वहां …

अपमान / भवानीप्रसाद मिश्र

अपमान का इतना असर मत होने दो अपने ऊपर सदा ही और सबके आगे कौन सम्मानित रहा है भू पर मन से ज्यादा तुम्हें कोई और नहीं जानता उसी से पूछकर जानते रहो उचित-अनुचित क्या-कुछ हो जाता है तुमसे हाथ …

कुछ सूखे फूलों के / भवानीप्रसाद मिश्र

कुछ सूखे फूलों के गुलदस्तों की तरह बासी शब्दों के बस्तों को फेंक नहीं पा रहा हूँ मैं गुलदस्ते जो सम्हालकर रख लिये हैं उनसे यादें जुड़ी हैं शब्दों में भी बसी हैं यादें बिना खोले इन बस्तों को बरसों …

सुनाई पड़ते हैं / भवानीप्रसाद मिश्र

सुनाई पड़ते हैं सुनाई पड़ते हैं कभी कभी उनके स्वर जो नहीं रहे दादाजी और बाई और गिरिजा और सरस और नीता और प्रायः सुनता हूँ जो स्वर वे शिकायात के होते हैं की बेटा या भैया या मन्ना ऐसी-कुछ …

पूरे एक वर्ष / भवानीप्रसाद मिश्र

सो जाओ आशाओं सो जाओ संघर्ष पूरे एक वर्ष अगले पूरे वर्षभर मैं शून्य रहूँगा न प्रकृति से जूझूँगा न आदमी से देखूँगा क्या मिलता है प्राण को हर्ष की शोक की इस कमी से इनके प्राचुर्य से तो ज्वर …

मैंने पूछा / भवानीप्रसाद मिश्र

मैंने पूछा तुम क्यों आ गई वह हँसी और बोली तुम्हें कुरूप से बचाने के लिए कुरूप है ज़रुरत से ज़्यादा धूप मैं छाया हूँ ज़रूरत से ज़्यादा धूप कुरूप है ना?

कहीं नहीं बचे / भवानीप्रसाद मिश्र

कहीं नहीं बचे हरे वृक्ष न ठीक सागर बचे हैं न ठीक नदियाँ पहाड़ उदास हैं और झरने लगभग चुप आँखों में घिरता है अँधेरा घुप दिन दहाड़े यों जैसे बदल गई हो तलघर में दुनिया कहीं नहीं बचे ठीक …

व्यक्तिगत (कविता) / भवानीप्रसाद मिश्र

मैं कुछ दिनों से एक विचित्र सम्पन्नता में पड़ा हूँ संसार का सब कुछ जो बड़ा है और सुन्दर है व्यक्तिगत रूप से मेरा हो गया है सुबह सूरज आता है तो मित्र की तरह मुझे दस्तक देकर जगाता है …