अपना अपना रंग / एजाज़ फारूक़ी

तू है इक ताँबे का थाल जो सूरज की गर्मी में सारा साल तपे कोई हल्का नीला बादल जब उस पर बूँदें बरसाए एक छनाका हो और बूँदें बादल को उड़ जाएँ ताँबा जलता रहे वो है इक बिजली का तार जिस के अंदर तेज़ और आतिश-नाक इक बर्क़ी-रौ दौड़े जो भीउस के पास से… Continue reading अपना अपना रंग / एजाज़ फारूक़ी

आहया / एजाज़ फारूक़ी

असा-ए-मूसा अँधेरी रातों की एक तज्सीम मुंजमिद जिस में हाल इक नुक़्ता-ए-सुकूनी न कोई हरकत न कोई रफ़्तार जब आसमानों से आग बरसी तो बर्फ़ पिघली धुआँ सा निकला असा में हरकत हुई तो महबूस नाग निकला वो एक सय्याल लम्हा जो मुंजमिद पड़ा था बढ़ा झपट कर ख़िज़ाँ-रसीदा शजर की सब ख़ुश्क टहनियों को… Continue reading आहया / एजाज़ फारूक़ी

करखाही हांडी जैसा /नचिकेता

करखाही हांडी हैसा हम कोने में धर दिए गए। सींढ़ लगी कुठिला में गेहूँ का हर दाना बीझ गया ज़्यादा मुँह आने के कारण पूरा तालू सीझ गया नामिक ख़तरों के तिलस्म में गायब हम कर दिए गए। लहूलुहान सदी के सिरहाने फन काढ़े हैं गेहुँअन पटेंटों की भेंट चढ़े सावन, भादों, कातिक,अगहन और मिलावट… Continue reading करखाही हांडी जैसा /नचिकेता

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गिरे ताड़ से /नचिकेता

गिरे ताड़ से मगर बीच में ही खजूर पर हम अँटके। घर की झोल लगी दीवारों पर हैं चमगादड़ लटके खूस गए हैं काठ धरन, ओलती, दरवाज़े,चौखट के और न जीवित रहे याद में गीत पनघट के। साँप सूंघ जाने के कारण हम लगते माहुर-माते उखड़ रही साँसों से कैसे आँखों की उलटन जातें नागफनी… Continue reading गिरे ताड़ से /नचिकेता

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वो आएगा दिल से दुआ तो करो / नक़्श लायलपुरी

वो आएगा दिल से दुआ तो करो नमाज़े-मुहब्बत अदा तो करो मिलेगा कोई बन के उनवान भी कहानी के तुम इब्तदा तो करो समझने लगोगे नज़र की ज़बां मुहब्बत से दिल आशना तो करो तुम्हें मार डालेंगी तन्हाईयाँ हमें अपने दिल से जुदा तो करो तुम्हारे करम से है यह ज़िंदगी मैं बुझ जाऊँगा तुम… Continue reading वो आएगा दिल से दुआ तो करो / नक़्श लायलपुरी

तुझको सोचा तो खो गईं आँखें / नक़्श लायलपुरी

तुझको सोचा तो खो गईं आँखें दिल का आईना हो गईं आँखें ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें कितना गहरा है इश्क़ का दरिया उसकी तह में डुबो गईं आँखें कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का कितनी वीरान हो गईं आँखें दो दिलों को नज़र के धागे से इक लड़ी… Continue reading तुझको सोचा तो खो गईं आँखें / नक़्श लायलपुरी

कुछ भी तो अब / नईम

कुछ भी तो अब तन्त नहीं है- ऊपरवाले की लाठी में। दीमक चाट गयी है शायद- ये भी ऊपरवाला जाने, भुस में तिनगी जिसने डाली- वही जमालो खाला जाने। हम तो खड़े हुए हैं घर के पानीपत हल्दीघाटी में। दो ही दिन में बासी लगने लगते हैं परिवर्तन प्रगतिशील होकर आते घर-घर में अब ऋण।… Continue reading कुछ भी तो अब / नईम

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लिख सकूँ तो (कविता) / नईम

लिख सकूँ तो— प्यार लिखना चाहता हूँ, ठीक आदमजात सा बेखौफ़ दिखना चाहता हूँ। थे कभी जो सत्य, अब केवल कहानी नर्मदा की धार सी निर्मल रवानी, पारदर्शी नेह की क्या बात करिए- किस क़दर बेलौस ये दादा भवानी। प्यार के हाथों घटी दर पर बज़ारों, आज बिकना चाहता हूँ। आपदा-से आये ये कैसे चरण… Continue reading लिख सकूँ तो (कविता) / नईम

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स्वै गई निशँक आज ये री परयँक पर / नंदराम

स्वै गई निशँक आज ये री परयँक पर , बँग भौँह वारो मोहिँ अँक मो लगा गयो । मुरली मुकुट कटि तट पीतपट तैसे , अटपटी चाल चित मेरो उरझा गयो । कहै नन्दराम मुरि मन्द मुसकाय , नेक समझि न पायो कछु कान मेँ सुना गयो । आ गयो अचानक देखा गयो मयँक मुख… Continue reading स्वै गई निशँक आज ये री परयँक पर / नंदराम

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सोहत हैँ सुख सेज दोऊ सुषमा से भरे सुख के सुखदायन / नंदराम

सोहत हैँ सुख सेज दोऊ सुषमा से भरे सुख के सुखदायन । त्योँ नन्दरामजू अँक भरै परयँक परै चित चौगुने चायन । चूमत हैँ कलकँज कपोल रचैँ रस ख्यालहूँ सील सुभायन । साँवरी राधा गुमान करै तब गोरे गुबिन्द परैँ लगि पायन ।

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