मन धक-धक की माला गूँथे / माखनलाल चतुर्वेदी

मन धक-धक की माला गूँथे, गूँथे हाथ फूल की माला, जी का रुधिर रंग है इसका इसे न कहो, फूल की माला! पंकज की क्या ताब कि तुम पर– मेरे जी से बढ़ कर फूले, मैं सूली पर झूल उठूँ तब, वह ’बेबस’ पानी पर झूले! तुम रीझो तो रीझो साजन, लख कर पंकज का… Continue reading मन धक-धक की माला गूँथे / माखनलाल चतुर्वेदी

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा / माखनलाल चतुर्वेदी

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा मेरी सुरत बावली बोली- उतर न सके प्राण सपनों से, मुझे एक सपने में ले ले। मेरा कौन कसाला झेले? तेर एक-एक सपने पर सौ-सौ जग न्यौछावर राजा। छोड़ा तेरा जगत-बखेड़ा चल उठ, अब सपनों में खेलें? मेरा कौन कसाला झेले? देख, देख, उस ओर `मित्र’ की इस बाजू पंकज… Continue reading ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा / माखनलाल चतुर्वेदी

उस प्रभात, तू बात न माने / माखनलाल चतुर्वेदी

उस प्रभात, तू बात न माने, तोड़ कुन्द कलियाँ ले आई, फिर उनकी पंखड़ियाँ तोड़ीं पर न वहाँ तेरी छवि पाई, कलियों का यम मुझ में धाया तब साजन क्यों दौड़ न आया? फिर पंखड़ियाँ ऊग उठीं वे फूल उठी, मेरे वनमाली! कैसे, कितने हार बनाती फूल उठी जब डाली-डाली! सूत्र, सहारा, ढूँढं न पाया… Continue reading उस प्रभात, तू बात न माने / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल राजा, स्वर अटूटे / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल राजा, स्वर अटूटे मौन का अब बाँध टूटे जी से दूर मान बैठी थी जी से कैसे दूर? बता दो? ऐ मेरे बनवासी राजा! दूरी बनी कुसूर? बता दो? उठ कि भू पर चाँद टूटे बोल राजा, स्वर अटूटे मौन का अब बाँध टूटे! उस दिन जिस दिन तुम हँस- उट्ठे, मैंने पुनर्जन्म को… Continue reading बोल राजा, स्वर अटूटे / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल राजा, बोल मेरे / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल राजा, बोल मेरे! दूर उस आकाश के- उस पार, तेरी कल्पनाएँ- बन निराशाएँ हमारी, भले चंचल घूम आएँ, किन्तु, मैं न कहूँ कि साथी, साथ छन भर डोल मेरे! बोल राजा, बोल मेरे! विश्व के उपहार, ये- निर्माल्य! मैं कैसे रिझाऊँ? कौन-सा इनमें कहूँ ’मेरा’? कि मैं कैसे चढ़ाऊँ? चढ़ विचारों में, उतर जी… Continue reading बोल राजा, बोल मेरे / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल तो किसके लिए मैं / माखनलाल चतुर्वेदी

बोल तो किसके लिए मैं गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ? प्राणों की मसोस, गीतों की- कड़ियाँ बन-बन रह जाती हैं, आँखों की बूँदें बूँदों पर, चढ़-चढ़ उमड़-घुमड़ आती हैं! रे निठुर किस के लिए मैं आँसुओं में प्यार खोलूँ? बोल तो किसके लिए मैं गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ? मत उकसा, मेरे मन मोहन कि मैं जगत-हित… Continue reading बोल तो किसके लिए मैं / माखनलाल चतुर्वेदी

जब तुमने यह धर्म पठाया / माखनलाल चतुर्वेदी

जब तुमने यह धर्म पठाया मुँह फेरा, मुझसे बिन बोले, मैंने चुप कर दिया प्रेम को और कहा मन ही मन रो ले कौन तुम्हारी बातें खोले! ले तेरा मजहब यह दौड़ा मौन प्रेम से कलह मचाने, और प्रेम ने प्रलय-रागिनी- भर दी अग-जग में अनबोले कौन तुम्हारी बातें खोले! मैंने बात तुम्हारी मानी ठुकरा… Continue reading जब तुमने यह धर्म पठाया / माखनलाल चतुर्वेदी

जिस ओर देखूँ बस / माखनलाल चतुर्वेदी

जिस ओर देखूँ बस अड़ी हो तेरी सूरत सामने, जिस ओर जाऊँ रोक लेवे तेरी मूरत सामने। छुपने लगूँ तुझसे मुझे तुझ बिन ठिकाना है नहीं, मुझसे छुपे तू जिस जगह बस मैं पकड़ पाऊँ वहीं। मैं कहीं होऊँ न होऊँ तू मुझे लाखों में हो, मैं मिटूँ जिस रोज मनहर तू मेरी आँखों में… Continue reading जिस ओर देखूँ बस / माखनलाल चतुर्वेदी

उड़ने दे घनश्याम गगन में / माखनलाल चतुर्वेदी

उड़ने दे घनश्याम गगन में| बिन हरियाली के माली पर बिना राग फैली लाली पर बिना वृक्ष ऊगी डाली पर फूली नहीं समाती तन में उड़ने दे धनश्याम गगन में! स्मृति-पंखें फैला-फैला कर सुख-दुख के झोंके खा-खाकर ले अवसर उड़ान अकुलाकर हुई मस्त दिलदार लगन में उड़ने दे धनश्याम गगन में! चमक रहीं कलियाँ चुन… Continue reading उड़ने दे घनश्याम गगन में / माखनलाल चतुर्वेदी

भाई, छेड़ो नही, मुझे / माखनलाल चतुर्वेदी

भाई, छेड़ो नहीं, मुझे खुलकर रोने दो यह पत्थर का हृदय आँसुओं से धोने दो, रहो प्रेम से तुम्हीं मौज से मंजु महल में, मुझे दुखों की इसी झोपड़ी में सोने दो। कुछ भी मेरा हृदय न तुमसे कह पायेगा, किन्तु फटेगा; फटे- बिना क्यों रह पायेगा; सिसक-सिसक सानंद आज होगी श्री-पूजा, बहे कुटिल यह… Continue reading भाई, छेड़ो नही, मुझे / माखनलाल चतुर्वेदी