तुम्हीं क्या समदर्शी भगवान / माखनलाल चतुर्वेदी

तु ही क्या समदर्शी भगवान? क्या तू ही है, अखिल जगत का न्यायाधीश महान? क्या तू ही लिख गया वासना दुनिया में है पाप? फिसलन पर तेरी आज्ञा- से मिलता कुम्भीपाक? फिर क्या तेरा धाम स्वर्ग है जो तप, बल से व्याप्त होती है वासना पूरिणी वहीं अप्सरा प्राप्त? क्या तू ही देता है जग-… Continue reading तुम्हीं क्या समदर्शी भगवान / माखनलाल चतुर्वेदी

माधव दिवाने हाव-भाव / माखनलाल चतुर्वेदी

माधव दिवाने हाव-भाव पै बिकाने अब कोई चहै वन्दै चहै निन्दै, काह परवाह वौरन ते बातें जिन कीजो नित आय-आय ज्ञान, ध्यान, खान, पान काहू की रही न चाह भोगन के व्यूह, तुम्हें भोगिबो हराम भयो दुख में उमाह, इहाँ चाहिये सदा ही आह, विपदा जो टूटै कोऊ सब सुख लूटै एक माधव न छूटै… Continue reading माधव दिवाने हाव-भाव / माखनलाल चतुर्वेदी

जहाँ से जो ख़ुद को / माखनलाल चतुर्वेदी

जहाँ से जो ख़ुद को जुदा देखते हैं ख़ुदी को मिटाकर ख़ुदा देखते हैं । फटी चिन्धियाँ पहिने, भूखे भिखारी फ़कत जानते हैं तेरी इन्तज़ारी बिलखते हुए भी अलख जग रहा है चिदानंद का ध्यान-सा लग रहा है । तेरी बाट देखूँ, चने तो चुगा जा, हैं फैले हुए पर, उन्हें कर लगा जा, मैं… Continue reading जहाँ से जो ख़ुद को / माखनलाल चतुर्वेदी

मत झनकार जोर से / माखनलाल चतुर्वेदी

मत झनकार जोर से स्वर भर से तू तान समझ ले, नीरस हूँ, तू रस बरसाकर, अपना गान समझ ले। फौलादी तारों से कस ले ’बंधन, मुझ पर बस ले, कभी सिसक ले कभी मुसक ले कभी खीझकर हँस ले, कान खेंच ले, पर न फेंक, गोदी से मुझे उठाकर, कर जालिम अपनी मनमानी पर,… Continue reading मत झनकार जोर से / माखनलाल चतुर्वेदी

दूर न रह, धुन बँधने दे / माखनलाल चतुर्वेदी

दूर न रह, धुन बँधने दे मेरे अन्तर की तान, मन के कान, अरे प्राणों के अनुपम भोले भान। रे कहने, सुनने, गुनने वाले मतवाले यार भाषा, वाक्य, विराम बिन्दु सब कुछ तेरा व्यापार; किन्तु प्रश्न मत बन, सुलझेगा- क्योंकर सुलझाने से? जीवन का कागज कोरा मत रख, तू लिख जाने दे।

हरा हरा कर, हरा / माखनलाल चतुर्वेदी

हरा हरा कर, हरा- हरा कर देने वाले सपने। कैसे कहूँ पराये, कैसे गरब करूँ कह अपने! भुला न देवे यह ’पाना’- अपनेपन का खो जाना, यह खिलना न भुला देवे पंखड़ियों का धो जाना; आँखों में जिस दिन यमुना- की तरुण बाढ़ लेती हूँ पुतली के बन्दी की पलकों नज़र झाड़ लेती हूँ।

कौन? याद की प्याली में / माखनलाल चतुर्वेदी

कौन? याद की प्याली में बिछुड़ना घोलता-सा क्यों है? और हृदय की कसकों में गुप-चुप टटोलता-सा क्यों है? अरे पुराने दुःख-दर्दों की गाँठ खोलता-सा क्यों है? महा प्रलय की वाणी में उन्मत्त बोलता-सा क्यों है? क्या है? है यह पुनः मधुर आमंत्रण जंजीरों का? है तू कौन? खिलाड़ी, प्रेरक मरदानों वीरों का?

सुलझन की उलझन है / माखनलाल चतुर्वेदी

सुलझन की उलझन है, कैसी दीवानी, दीवानी! पुतली पर चढ़कर गिरता गिर कर चढ़ता है पानी! क्या ही तल के पागलपन का मल धोने आई हैं? प्रलयंकर शंकर की गंगा जल होने आई हैं? बूँदे , बरछी की नौकों-सी मुझसे खेल रही है! पलकों पर कितना प्राणों– का ज्वार ढकेल रही है! अब क्या रुम-झुम… Continue reading सुलझन की उलझन है / माखनलाल चतुर्वेदी

नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा / माखनलाल चतुर्वेदी

नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा गीत के तार-तारों उठी छा गई प्राण के बाग में प्रीति की पंखिनी बोल बोली सलोने कि मैं आ गई! नेह दे नाथ क्या नृत्य के रंग में भावना की रवानी लुटाने चले? साँस के पास आ, हास के देस छा, याद को झुलने में झूलाने चले! प्रेम… Continue reading नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा / माखनलाल चतुर्वेदी

चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ / माखनलाल चतुर्वेदी

चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ, डालियों को यों चिताने-सी लगी आँख की कलियाँ, अरी, खोलो जरा, हिल खपतियों को जगाने-सी लगी पत्तियों की चुटकियाँ झट दीं बजा, डालियाँ कुछ- ढुलमुलाने-सी लगीं, किस परम आनन्द- निधि के चरण पर, विश्व-साँसें गीत गाने-सी लगीं। जग उठा तरु-वृन्द-जग, सुन घोषणा, पंछियों में चहचहाहट मच गई; वायु का झोंका… Continue reading चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ / माखनलाल चतुर्वेदी