Makhanlal Chaturvedi Archive

यह अमर निशानी किसकी है? / माखनलाल चतुर्वेदी

यह अमर निशानी किसकी है? बाहर से जी, जी से बाहर- तक, आनी-जानी किसकी है? दिल से, आँखों से, गालों तक- यह तरल कहानी किसकी है? यह अमर निशानी किसकी है? रोते-रोते भी आँखें मुँद- जाएँ, सूरत दिख जाती है, …

मैंने देखा था, कलिका के / माखनलाल चतुर्वेदी

मैंने देखा था, कलिका के कंठ कालिमा देते मैंने देखा था, फूलों में उसको चुम्बन लेते मैंने देखा था, लहरों पर उसको गूँज मचाते दिन ही में, मैंने देखा था उसको सोरठ गाते। दर्पण पर, सिर धुन-धुन मैंने देखा था …

महलों पर कुटियों को वारो / माखनलाल चतुर्वेदी

महलों पर कुटियों को वारो पकवानों पर दूध-दही, राज-पथों पर कुंजें वारों मंचों पर गोलोक मही। सरदारों पर ग्वाल, और नागरियों पर बृज-बालायें हीर-हार पर वार लाड़ले वनमाली वन-मालायें छीनूँगी निधि नहीं किसी- सौभागिनि, पूण्य-प्रमोदा की लाल वारना नहीं कहीं …

सजल गान, सजल तान / माखनलाल चतुर्वेदी

सजल गान, सजल तान स-चमक चपला उठान, गरज-घुमड़, ठान-ठान बिन्दु-विकल शीत प्राण; थोथे ये मोह-गीत एक गीत, एक गीत! छू मत आचार्य ’ग्रन्थ’ जिसके पद-पद अनंत, वाद-वाद, पन्थ-पन्थ, व्यापक पूरक दिगंत; लघु मैं, कर मत सभीत। एक गीत, एक गीत! …

आज नयन के बँगले में / माखनलाल चतुर्वेदी

आज नयन के बँगले में संकेत पाहुने आये री सखि! जी से उठे कसक पर बैठे और बेसुधी- के बन घूमें युगल-पलक ले चितवन मीठी, पथ-पद-चिह्न चूम, पथ भूले! दीठ डोरियों पर माधव को बार-बार मनुहार थकी मैं पुतली पर …

मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक / माखनलाल चतुर्वेदी

मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक! प्रलय-प्रणय की मधु-सीमा में जी का विश्व बसा दो मालिक! रागें हैं लाचारी मेरी, तानें बान तुम्हारी मेरी, इन रंगीन मृतक खंडों पर, अमृत-रस ढुलका दो मालिक! मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक! जब मेरा अलगोजा …

उठ अब, ऐ मेरे महाप्राण / माखनलाल चतुर्वेदी

उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण! आत्म-कलह पर विश्व-सतह पर कूजित हो तेरा वेद गान! उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण! जीवन ज्वालामय करते हों लेकर कर में करवाल करते हों आत्मार्पण से भू के मस्तक को लाल! किन्तु तर्जनी …

तुम्हीं क्या समदर्शी भगवान / माखनलाल चतुर्वेदी

तु ही क्या समदर्शी भगवान? क्या तू ही है, अखिल जगत का न्यायाधीश महान? क्या तू ही लिख गया वासना दुनिया में है पाप? फिसलन पर तेरी आज्ञा- से मिलता कुम्भीपाक? फिर क्या तेरा धाम स्वर्ग है जो तप, बल …

माधव दिवाने हाव-भाव / माखनलाल चतुर्वेदी

माधव दिवाने हाव-भाव पै बिकाने अब कोई चहै वन्दै चहै निन्दै, काह परवाह वौरन ते बातें जिन कीजो नित आय-आय ज्ञान, ध्यान, खान, पान काहू की रही न चाह भोगन के व्यूह, तुम्हें भोगिबो हराम भयो दुख में उमाह, इहाँ …

जहाँ से जो ख़ुद को / माखनलाल चतुर्वेदी

जहाँ से जो ख़ुद को जुदा देखते हैं ख़ुदी को मिटाकर ख़ुदा देखते हैं । फटी चिन्धियाँ पहिने, भूखे भिखारी फ़कत जानते हैं तेरी इन्तज़ारी बिलखते हुए भी अलख जग रहा है चिदानंद का ध्यान-सा लग रहा है । तेरी …