पतवार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार। आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज ह्रदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार। लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार… Continue reading पतवार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

असमंजस / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

जीवन में कितना सूनापन पथ निर्जन है, एकाकी है, उर में मिटने का आयोजन सामने प्रलय की झाँकी है वाणी में है विषाद के कण प्राणों में कुछ कौतूहल है स्मृति में कुछ बेसुध-सी कम्पन पग अस्थिर है, मन चंचल है यौवन में मधुर उमंगें हैं कुछ बचपन है, नादानी है मेरे रसहीन कपालो पर… Continue reading असमंजस / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार पथ ही मुड़ गया था। गति मिली मैं चल पड़ा पथ पर कहीं रुकना मना था, राह अनदेखी, अजाना देश संगी अनसुना था। चांद सूरज की तरह चलता न जाना रात दिन है, किस तरह हम तुम गए मिल आज भी कहना कठिन है, तन न आया मांगने अभिसार मन… Continue reading मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

चलना हमारा काम है / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

गति प्रबल पैरों में भरी फिर क्यों रहूं दर दर खडा जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पडा जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है। कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया कुछ बोझ अपना बँट गया अच्छा हुआ, तुम मिल गई कुछ रास्ता ही कट… Continue reading चलना हमारा काम है / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

सांसों का हिसाब / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तुम जो जीवित कहलाने के हो आदी तुम जिसको दफ़ना नहीं सकी बरबादी तुम जिनकी धड़कन में गति का वन्दन है तुम जिसकी कसकन में चिर संवेदन है तुम जो पथ पर अरमान भरे आते हो तुम जो हस्ती की मस्ती में गाते हो तुम जिनने अपना रथ सरपट दौड़ाया कुछ क्षण हाँफे, कुछ साँस… Continue reading सांसों का हिसाब / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

आषाढ़ का पहला दिवस / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

करता विवश उमड़ी घटा को देखकर चूमूँ लहराते केश को पी लूँ तपन, सीझूँ सपन गदरा उठूँ इतरा उठूँ पातीम्बरी आकाश में उलझी हुई नीलाम्बरी के छोर-सा, टपकूँ निबौरी-सा निपट थिरकूँ विसुध वन-मोर-सा, बौछार के उल्लास में सोंधी धारा की गंध को पी लूँ तृषित गजराज-सा झूमूँ सहज हर सल्लकी औ’ शाल की मदविह्वला नत… Continue reading आषाढ़ का पहला दिवस / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

इनको चूमो / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

कीचड़-कालिख से सने हाथ इनको चूमो सौ कामिनियों के लोल कपोलों से बढ़कर जिसने चूमा दुनिया को अन्न खिलाया है आतप-वर्षा-पाले से सदा बचाया है। श्रम-सीकर से लथपथ चेहरे इनको चूमो गंगा-जमुना की लोल-लहरियों से बढ़कर माँ-बहनों की लज्जा जिनके बल पर रक्षित बुन चीर द्रौपदी का हर बार बढाया है। कुश-कंटक से क्षत-विक्षत पग… Continue reading इनको चूमो / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

ठहराव / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तुम तो यहीं ठहर गये ठहरे तो किले बान्धो मीनारें गढ़ो उतरो चढ़ो उतरो चढ़ो कल तक की दूसरों की आज अपनी रक्षा करों, मुझको तो चलना है अन्धेरे में जलना है समय के साथ-साथ ढलना है इसलिये मैने कभी बान्धे नहीं परकोटे साधी नहीं सरहदें औ’ गढ़ी नहीं मीनारें जीवन भर मुक्त बहा सहा… Continue reading ठहराव / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांग / गजानन माधव मुक्तिबोध

स्वप्न के भीतर स्वप्न, विचारधारा के भीतर और एक अन्य सघन विचारधारा प्रच्छन!! कथ्य के भीतर एक अनुरोधी विरुद्ध विपरीत, नेपथ्य संगीत!! मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क उसके भी अन्दर एक और कक्ष कक्ष के भीतर एक गुप्त प्रकोष्ठ और कोठे के साँवले गुहान्धकार में मजबूत…सन्दूक़ दृढ़, भारी-भरकम और उस सन्दूक़ भीतर कोई बन्द है… Continue reading दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांग / गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे कदम-कदम पर / गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं बांहें फैलाए! एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं, मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ, बहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपने…. सब सच्चे लगते हैं, अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है, मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ, जाने क्या मिल जाए! मुझे… Continue reading मुझे कदम-कदम पर / गजानन माधव मुक्तिबोध