इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैं जब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं। तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता है कुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है। लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँ यों ही सूने में… Continue reading बात की बात / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
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जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग ३
घिरी लंका के चारों ओर गहरा गूढ़ खाई थी इन्हीं गड्ढों से महलों की गगनभेदी ऊँचाई थी हज़ारों अस्मतों को लूटकर वह खिलखिलाता था स्वयं सूरज तमस से तुप गया था, तिलमिलाता था सभी भूखे थे नंगे थे, तबाही ही तबाही थी मगर अन्याय का प्रतिरोध करने की मनाही थी किसी ने न्याय माँगा तो… Continue reading जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग ३
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग २
तुम मनाते हो जिसे कहकर दिवाली यह नहीं कोई प्रथा नूतन निराली आज भी जग में अमा की रात काली स्नेह से नव मृत्तिका के पात्र खाली अधर सूखे, गाल पिचके, दीन कोटरलीन आँखें शलभ बेसुध छटपटाते क्लिन्न मन विछिन्न पाँखें मुर्दनी वातावरण में धुएँ की घूर्णित घुटन-सी दर-ब-दर फैली हुई, बदबू विकट शव के… Continue reading जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग २
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग १
दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती हँसी धरती मोतियों के बीज बोती सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती एक… Continue reading जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ / भाग १
मृत्तिका दीप / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मृत्तिका का दीप तब तक जलेगा अनिमेष एक भी कण स्नेह का जब तक रहेगा शेष। हाय जी भर देख लेने दो मुझे मत आँख मीचो और उकसाते रहो बाती न अपने हाथ खींचो प्रात जीवन का दिखा दो फिर मुझे चाहे बुझा दो यों अंधेरे में न छीनो- हाय जीवन-ज्योति के कुछ क्षीण कण… Continue reading मृत्तिका दीप / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
पर आँखें नहीं भरीं / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
कितनी बार तुम्हें देखा पर आँखें नहीं भरीं। सीमित उर में चिर-असीम सौंदर्य समा न सका बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग मन रोके नहीं रुका यों तो कई बार पी-पीकर जी भर गया छका एक बूँद थी, किंतु, कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी। कितनी बार तुम्हें देखा पर आँखें नहीं भरीं। शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी कण-कण में… Continue reading पर आँखें नहीं भरीं / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
आभार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही हो जाता पथ पर मेल कहीं सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल तय कर लेना कुछ खेल नहीं दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते सम्मुख चलता पथ का प्रमाद जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद। साँसों पर अवलम्बित काया जब… Continue reading आभार / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ। चल रहा हूँ, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती, जल रहा हूँ क्योंकि जलने से तमिस्त्रा चूर होती, गल रहा हूँ क्योंकि हल्का बोझ हो जाता हृदय का, ढल रहा हूँ क्योंकि ढलकर साथ पा जाता समय का। चाहता तो था कि रुक लूँ… Continue reading मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
विवशता / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार पथ ही मुड़ गया था। गति मिली, मैं चल पड़ा, पथ पर कहीं रुकना मना था राह अनदेखी, अजाना देश संगी अनसुना था। चाँद सूरज की तरह चलता, न जाना रात दिन है किस तरह हम-तुम गए मिल, आज भी कहना कठिन है। तन न आया माँगने अभिसार मन ही… Continue reading विवशता / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
सूनी साँझ / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। पेड खडे फैलाए बाँहें लौट रहे घर को चरवाहे यह गोधुली, साथ नहीं हो तुम, बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में चहचह चहचह मीड़-मीड़ में धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम, बहुत दिनों… Continue reading सूनी साँझ / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’