प्रार्थना की कड़ी / धर्मवीर भारती

प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी बाँध देती है, तुम्हारा मन, हमारा मन, फिर किसी अनजान आशीर्वाद में-डूबन मिलती मुझे राहत बड़ी! प्रात सद्य:स्नात कन्धों पर बिखेरे केश आँसुओं में ज्यों धुला वैराग्य का सन्देश चूमती रह-रह बदन को अर्चना की धूप यह सरल निष्काम पूजा-सा तुम्हारा रूप जी सकूँगा सौ जनम अँधियारियों में, यदि मुझे… Continue reading प्रार्थना की कड़ी / धर्मवीर भारती

तुम्हारे चरण / धर्मवीर भारती

ये शरद के चाँद-से उजले धुले-से पाँव, मेरी गोद में ! ये लहर पर नाचते ताज़े कमल की छाँव, मेरी गोद में ! दो बड़े मासूम बादल, देवताओं से लगाते दाँव, मेरी गोद में ! रसमसाती धूप का ढलता पहर, ये हवाएँ शाम की, झुक-झूमकर बरसा गईं रोशनी के फूल हरसिंगार-से, प्यार घायल साँप-सा लेता… Continue reading तुम्हारे चरण / धर्मवीर भारती

ठण्डा लोहा (कविता) / धर्मवीर भारती

ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा! मेरी स्वप्न भरी पलकों पर मेरे गीत भरे होठों पर मेरी दर्द भरी आत्मा पर स्वप्न नहीं अब गीत नहीं अब दर्द नहीं अब एक पर्त ठंडे लोहे की मैं जम कर लोहा बन जाऊँ – हार मान लूँ – यही शर्त… Continue reading ठण्डा लोहा (कविता) / धर्मवीर भारती

अक्र चहार का मक़बरा / एज़रा पाउण्ड / धर्मवीर भारती

मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, निकुपतिस्, मैंने निगरानी की है पिछले पचास लाख वर्षों से, और तुम्हारी मुर्दा आँखें हिलीं नहीं, न मेरे रति-संकेतों को समझ सकीं और तुम्हारे कृश अंग, जिसमें मैं धधकती हुई चलती थी, अब मेरे या अन्य किसी अग्निवर्णी वस्तु के स्पर्श से धधक नहीं उठते ! देखो तुम्हारे सिरहाने तकिया लगाने… Continue reading अक्र चहार का मक़बरा / एज़रा पाउण्ड / धर्मवीर भारती

एक लड़की / एज़रा पाउण्ड / धर्मवीर भारती

एक वृक्ष मेरे हाथों में समाविष्ट हो गया है मेरी बाँहों में अन्दर-अन्दर वृक्ष रस चढ़ रहा है वृक्ष मेरे वक्ष में उग गया है अधोमुखी, डालें मुझमें से उग रही हैं-बाँहों की तरह वृक्ष वह तुम हो तुम हो हरी काई तुम हो वायलेट के फूल जिन पर हवा लहराती है एक शिशु-और इतने… Continue reading एक लड़की / एज़रा पाउण्ड / धर्मवीर भारती

सृजन का शब्द / जाँ स्टार अण्टर मेयेर / धर्मवीर भारती

आरम्भ में केवल शब्द था किन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने में कि वह किसी से कहा जाय मौन को टूटना अनिवार्य था शब्द का कहा जाना था ताकि प्रलय का अराजक तिमिर व्यवस्थित उजियाले में रूपान्तरित हो ताकि रेगिस्तान गुलाबों की क्यारी बन जाय शब्द का कहा जाना अनिवार्य था। आदम की पसलियों के… Continue reading सृजन का शब्द / जाँ स्टार अण्टर मेयेर / धर्मवीर भारती

गोदना / वालेस स्टीवेन्स / धर्मवीर भारती

रोशनी मकड़ी है जल पर रेंगती है बर्फ़ के किनारों पर तुम्हारी पलकों के तले और वहाँ अपना जाला बुनती है अपने दो जाले तुम्हारे नेत्रों के जाले हिलगे हैं, तुम्हारे माँस और अस्थियों से जैसे छत की कड़ियों या घासों से तुम्हारे नेत्रों के डोरे हैं जल की सतह पर बर्फ़ के छोरों पर।

गीत / रामधारी सिंह “दिनकर”

गीत उर की यमुना भर उमड़ चली, तू जल भरने को आ न सकी; मैं ने जो घाट रचा सरले! उस पर मंजीर बजा न सकी। दिशि-दिशि उँडेल विगलित कंचन, रँगती आई सन्ध्या का तन, कटि पर घट, कर में नील वसन; कर नमित नयन चुपचाप चली, ममता मुझ पर दिखला न सकी; चरणों का… Continue reading गीत / रामधारी सिंह “दिनकर”

कत्तिन का गीत / रामधारी सिंह “दिनकर”

कत्तिन का गीत कात रही सोने का गुन चाँदनी रूप-रस-बोरी; कात रही रुपहरे धाग दिनमणि की किरण किशोरी। घन का चरखा चला इन्द्र करते नव जीवन दान; तार-तार पर मैं काता करती इज्जत-सम्मान। हरी डार पर श्वेत फूल, यह तूल-वृक्ष मन भाया; श्याम हिन्द हिम-मुकुट-विमणिडत खेतों में मुस्काया। श्वेत कमल-सी रूई मेरी, मैं कमला महारानी;… Continue reading कत्तिन का गीत / रामधारी सिंह “दिनकर”