नश्शा-ए-मय के सिवा कितने नशे और भी हैं कुछ बहाने मेरे जीने के लिए और भी हैं ठंडी-ठंडी सी मगर गम से है भरपूर हवा कई बादल मेरी आँखों से परे और भी हैं ज़िंदगी आज तलक जैसे गुज़ारी है न पूछ ज़िंदगी है तो अभी कितने मजे और भी हैं हिज्र तो हिज्र था… Continue reading नश्शा-ए-मय के सिवा कितने नशे और भी हैं / खलीलुर्रहमान आज़मी
वंदे मातरम् / कन्हैयालाल दीक्षित ‘इंद्र’
बोलियो सब मिल महाशय मंत्र वंदे मातरम्, तीनों भुवन में गूंज जाए शब्द वंदे मातरम्। बन जाए सुखदाई हमारा मंत्र वंदे मातरम्, हो हमारी पाठ-पूजा मंत्र वंदे मातरम्। मंदिर व मस्जिद और गुरुद्वारा व गिरजा हो यही, मज़हब बने हम सभी का एक वंदे मातरम्। हाथ में हो हथकड़ी और बेड़ियां हों पांव में, गाएंगे… Continue reading वंदे मातरम् / कन्हैयालाल दीक्षित ‘इंद्र’
खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें / क़तील
खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें… Continue reading खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें / क़तील
विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है / क़तील
विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है वो रंग तू ने मेरी निगाहों पे जो बिखेरा पलट गया है कहाँ की ज़ुल्फ़ें कहाँ के बादल सिवाए तीरा-नसीबों के मेरी नज़र ने जिसे पुकारा वही अँधेरा पलट गया है न छाँव करने को है वो आँचल न चैन लेने को हैं वो… Continue reading विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है / क़तील
तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले / क़तील
तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-ना-काम से पहले ये आलम देख कर तू ने भी आँखें फेर लीं वरना कोई गर्दिश नहीं थी गर्दिश-ए-अय्याम से पहले गिरा है टूट कर शायद मेरी तक़दीर का तारा कोई आवाज़ आई थी शिकस्त-ए-जाम से पहले कोई कैसे करे दिल में छुपे… Continue reading तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले / क़तील
सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो / क़तील
सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो रात का पत्थर न पिघलेगा शुआओं के बग़ैर सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो तुम को है मालूम आख़िर कौन सा… Continue reading सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो / क़तील
शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है / क़तील
शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है दरवाज़ा मेरे घर का बीनाई चाहता है औक़ात-ए-ज़ब्त उस को ऐ चश्म-ए-तर बता दे ये दिल समंदरों की गहराई चाहता है शहरों में वो घुटन है इस दौर में के इंसाँ गुमनाम जंगलों की पुरवाई चाहता है कुछ ज़लज़ले समो कर ज़ंजीर की ख़नक में इक रक़्स-ए-वालेहाना सौदाई… Continue reading शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है / क़तील
फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा / क़तील
फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा अब है यही इंसाफ़ का आलम देखने वाले देखता जा परवानों की राख उड़ा दी बाद-ए-सहर के झोंकों ने शम्मा बनी है पैकर-ए-मातम देखने वाले देखता जा जाम-ब-जाम लगी हैं मोहरें मय-ख़ानों पर पहरे हैं रोती है बरसात छमा-छम देखने वाले देखता जा इस नगरी… Continue reading फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा / क़तील
मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था / क़तील
मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था वो इस लिए के राह का पत्थर भी मैं ही था शक हो चला था मुझ को ख़ुद अपनी ही ज़ात पर झाँका तो अपने ख़ोल के अंदर भी मैं ही था होंगे मेरे वजूद के साए अलग अलग वरना बरून-ए-दर भी पस-ए-दर भी… Continue reading मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था / क़तील
क्या जाने किस ख़ुमार में / क़तील
क्या जाने किस ख़ुमार में किस जोश में गिरा वो फल शजर से जो मेरी आग़ोश में गिरा कुछ दाएरा से बन गए साथ-ए-ख़याल पर जब कोई फूल साग़र-ए-मय-नोश में गिरा बाक़ी रही न फिर वो सुनहरी लकीर भी तारा जो टूट कर शब-ए-ख़ामोश में गिरा उड़ता रहा तो चाँद से यारा न था मेरा… Continue reading क्या जाने किस ख़ुमार में / क़तील