कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंट एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे ख़्वाहिशों का ख़ूँ बहाएगा… Continue reading कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है समझता हूँ ग़ुबार-ए-आसमाँ फैला हुआ है मैं इस को देखने और भूल जाने में मगन हूँ मेरे आगे जो ये ख़्वाब-ए-रवाँ फैला हुआ है इन्ही दो हैरतों के दरमियाँ मौजूद हूँ मैं सर-ए-आब-ए-यक़ीं अक्स-ए-गुमाँ फैला हुआ है रिहाई की कोई सूरत निकलनी चाहिए अब ज़मीं सहमी… Continue reading जहाँ मेरे न होने का निशाँ फैला हुआ है / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा खिला है कोई कह दे अगर पहले कभी ऐसा खिला है अज़ल से गुलशन-ए-हस्ती में है मौजूद भी वो मगर लगता है जैसे आज ही ताज़ा खिला है बहम कैसे हुए हैं देखना ख़्वाब और ख़ुश-बू गुज़रते मौसमों का आख़िरी तोहफ़ा खिला है लहू में इक अलग अंदाज़ से मस्तूर… Continue reading चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

चलो इतनी तो आसानी रहेगी / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

चलो इतनी तो आसानी रहेगी मिलेंगे और परेशानी रहेगी इसी से रौनक़-ए-दरिया-ए-दिल है यही इक लहर तूफ़ानी रहेगी कभी ये शौक़ ना-मानूस होगा कभी वो शक्ल अनजानी रहेगी निकल जाएगी सूरत आइने से हमारे घर में हैरानी रहेगी सुबुक-सर हो के जीना है कोई दिन अभी कुछ दिन गिराँ-जानी रहेगी सुनोगे लफ़्ज़ में भी फड़फड़ाहट… Continue reading चलो इतनी तो आसानी रहेगी / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

बस एक बार किसी ने गले लगाया था / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

बस एक बार किसी ने गले लगाया था फिर उस के बाद न मैं था न मेरा साया था गली में लोग भी थे मेरे उस के दुश्मन लोग वो सब पे हँसता हुआ मेरे दिल में आया था उस एक दश्त में सौ शहर हो गए आबाद जहाँ किसी ने कभी कारवाँ लुटाया था… Continue reading बस एक बार किसी ने गले लगाया था / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

अभी आखें खुली हैं और क्या क्या / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

अभी आखें खुली हैं और क्या क्या देखने को मुझे पागल किया उस ने तमाशा देखने को वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा अभी वर्ना पड़ी थी एक दुनिया देखने को तमन्ना की किसे परवा के सोने जागने में मुयस्सर हैं बहुत ख़्वाब-ए-तमन्ना देखने को ब-ज़ाहिर मुतमइन मैं भी… Continue reading अभी आखें खुली हैं और क्या क्या / ‘ज़फ़र’ इक़बाल

राम नाम जगसार और सब झुठे बेपार / छत्रनाथ

राम नाम जगसार और सब झुठे बेपार। तप करु तूरी, ज्ञान तराजू, मन करु तौलनिहार। षटधारी डोरी तैहि लागे, पाँच पचीस पेकार। सत्त पसेरी, सेर करहु नर, कोठी संत समाज। रकम नरायन राम खरीदहुँ, बोझहुँ, तनक जहाज। बेचहुँ विषय विषम बिनु कौड़ी, धर्म करहु शोभकार। मंदिर धीर, विवेक बिछौना, नीति पसार बजार। ऐसो सुघर सौदागर… Continue reading राम नाम जगसार और सब झुठे बेपार / छत्रनाथ

जय, देवि, दुर्गे, दनुज गंजनि / छत्रनाथ

जय, देवि, दुर्गे, दनुज गंजनि, भक्त-जन-भव-भार-भंजनि, अरुण गति अति नैन खंजनि, जय निरंजनि हे। जय, घोर मुख-रद विकट पाँती, नव-जलद-तन, रुचिर काँती, मारु कर गहि सूल, काँती, असुर-छाती हे। जय, सिंह चढ़ि कत समर धँसि-धँसि, विकट मुख विकराल हँसि-हँसि, शुंभ कच गहि कएल कर बसि, मासु गहि असि हे। जय अमर अरि सिर काटु छट्… Continue reading जय, देवि, दुर्गे, दनुज गंजनि / छत्रनाथ

आश्चर्य / छगनलाल सोनी

भीष्म नहीं चाहते थे परिवार का बिखराव कृष्ण नहीं चाहते थे एक युग की समप्ति धृतराष्ट्र नहीं चाहते थे राज-पतन द्रौपदी नहीं चाहती थी- चीर हरण। इसके बावजूद वह सब हुआ जो नहीं होना था आज हमारा न चाहना हमारी चुप्पी में चाहने की स्वीकृति ही तो है तालियों से झर रही है शर्म उतर… Continue reading आश्चर्य / छगनलाल सोनी

माँ / छगनलाल सोनी

माँ तुम्हें पढ़कर तुम्हारी उँगली की धर कलम गढ़ना चाहता हूँ तुम सी ही कोई कृति तुम्हारे हृदय के विराट विस्तार में पसरकर सोचता हूँ मैं और खो जाता हूँ कल्पना लोक में फिर भी सम्भव नहीं तुम्हें रचना शब्दों का आकाश छोटा पड़ जाता है हर बार तुम्हारी माप से माँ तुम धरती हो।