Varsha singh Archive

मुझको घर-बार बुलाती हैं वो बूढ़ी आँखें / वर्षा सिंह

मुझको घर-बार बुलाती हैं वो बूढ़ी आँखें । दे के थपकी-सी सुलाती हैं वो बूढ़ी आँखें । जब कभी पाँव में चुभ जाते हैं काँटे मेरे बोझ पीड़ा का उठाती हैं वो बूढ़ी आँखें । वही चौपाई, वही कलमा, वही …

जाने किसकी राह देखतीं, आस भरी बूढ़ी आँखें / वर्षा सिंह

जाने किसकी राह देखतीं, आस भरी बूढ़ी आँखें । इंतज़ार की पीड़ा सहतीं, रात जगी बूढ़ी आँखें । दुनिया का दस्तूर निराला, स्वारथ के सब मीत यहाँ फ़र्क नहीं कर पातीं कुछ भी, नेह पगी बूढ़ी आँखें । आते हैं …