केहि समुझावौ सब जग अन्धा॥ टेक॥ इक दु होयँ उन्हैं समुझावौं सबहि भुलाने पेटके धन्धा। पानी घोड पवन असवरवा ढरकि परै जस ओसक बुन्दा॥ १॥ गहिरी नदी अगम बहै धरवा खेवन-हार के पडिगा फन्दा। घर की वस्तु नजर नहि आवत दियना बारिके ढूँढत अन्धा॥ २॥ लागी आगि सबै बन जरिगा बिन गुरुज्ञान भटकिगा बन्दा। कहै… Continue reading केहि समुझावौ / कबीर
Category: Kabir
दिवाने मन / कबीर
दिवाने मन भजन बिना दुख पैहौ ॥ टेक॥ पहिला जनम भूत का पै हौ सात जनम पछिताहौ। काँटा पर का पानी पैहौ प्यासन ही मरि जैहौ॥ १॥ दूजा जनम सुवा का पैहौ बाग बसेरा लैहौ। टूटे पंख मॅंडराने अधफड प्रान गॅंवैहौ॥ २॥ बाजीगर के बानर हो हौ लकडिन नाच नचैहौ। ऊॅंच नीच से हाय पसरि… Continue reading दिवाने मन / कबीर
झीनी झीनी बीनी चदरिया / कबीर
झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥ काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥ इडा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥ आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥ साँ को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥ सो… Continue reading झीनी झीनी बीनी चदरिया / कबीर
रे दिल गाफिल / कबीर
रे दिल गाफिल गफलत मत कर एक दिना जम आवेगा॥ टेक॥ सौदा करने या जग आया पूजी लाया मूल गँवाया प्रेमनगर का अन्त न पाया ज्यों आया त्यों जावेगा॥ १॥ सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता या जीवन में क्या क्या कीता सिर पाहन का बोझा लीता आगे कौन छुड़ावेगा॥ २॥ परलि पार तेरा मीता… Continue reading रे दिल गाफिल / कबीर
करम गति टारै / कबीर
करम गति टारै नाहिं टरी॥ टेक॥ मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी सिधि के लगन धरि। सीता हरन मरन दसरथ को बनमें बिपति परी॥ १॥ कहँ वह फन्द कहाँ वह पारधि कहॅं वह मिरग चरी। कोटि गाय नित पुन्य करत नृग गिरगिट-जोन परि॥ २॥ पाण्डव जिनके आप सारथी तिन पर बिपति परी। कहत कबीर सुनो भै… Continue reading करम गति टारै / कबीर
जीवन की महिमा / कबीर
जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय | मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय || जीते जी ही मरना अच्छा है, यदि कोई मरना जाने तो| मरने के पहले ही जो मर लेता है, वह अजर – अमर हो जाता है| शरीर रहते रहते जिसके समस्त अहंकार समाप्त हो गए, वे वासना… Continue reading जीवन की महिमा / कबीर
सहजता की महिमा / कबीर
सहज सहज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं कोय | जिन सहजै विषया तजै, सहज कहावै सोय || सहज – सहज सब कहते हैं, परन्तु उसे समझते नहीं जिन्होंने सहजरूप से विषय – वासनाओं का परित्याग कर दिया है, उनकी निर्विश्ये – स्थिति ही सहज कहलाती है| जो कछु आवै सहज में सोई मीठा जान… Continue reading सहजता की महिमा / कबीर
मन की महिमा / कबीर
कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव | भावै गुरु की भक्ति करू, भावै विषय कमाव || गुरु कबीर जी कहते हैं कि मन तो एक ही है, जहाँ अच्छा लगे वहाँ लगाओ| चाहे गुरु की भक्ति करो, चाहे विषय विकार कमाओ| कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु | विष की बेली… Continue reading मन की महिमा / कबीर
परमारथ की महिमा / कबीर
मरूँ पर माँगू नहीं, अपने तन के काज | परमारथ के कारने, मोहिं न आवै लाज || मर जाऊँ, परन्तु अपने शरीर के स्वार्थ के लिए नहीं माँगूँगा| परन्तु परमार्थ के लिए माँगने में मुझे लज्जा नहीं लगती| सुख के संगी स्वारथी, दुःख में रहते दूर | कहैं कबीर परमारथी, दुःख – सुख सदा हजूर… Continue reading परमारथ की महिमा / कबीर
निष्काम की महिमा / कबीर
संसारी से प्रीतड़ी, सरै न एको काम | दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम || संसारियों से प्रेम जोड़ने से, कल्याण का एक काम भी नहीं होता| दुविधा में तुम्हारे दोनों चले जयेंगे, न माया हाथ लगेगी न स्वस्वरूप स्तिथि होगी, अतः जगत से निराश होकर अखंड वैराग्ये करो| स्वारथ का सब कोई… Continue reading निष्काम की महिमा / कबीर