तालीम लड़कियों की ज़रूरी तो है मगर ख़ातूने-ख़ाना हों, वे सभा की परी न हों जो इल्मों-मुत्तकी हों, जो हों उनके मुन्तज़िम उस्ताद अच्छे हों, मगर ‘उस्ताद जी’ न हों तालीमे-दुख़तराँ से ये उम्मीद है ज़रूर नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बारात में हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-ज़ब्ती समझते हैं कि जिनको पढ़ के… Continue reading हास्य-रस -चार / अकबर इलाहाबादी
Category: Hindi-Urdu Poets
हास्य-रस -तीन / अकबर इलाहाबादी
पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ है इतना उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता दिल में अब नूरे-ख़ुदा के दिन गए हड्डियों में फॉसफ़ोरस देखिए मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला- “नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ” नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब पर्दा शमा -ए -ख़ामोश… Continue reading हास्य-रस -तीन / अकबर इलाहाबादी
हास्य-रस -दो / अकबर इलाहाबादी
* पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया ‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया * बोला चपरासी जो मैं पहुँचा ब-उम्मीदे-सलाम- “फाँकिये ख़ाक़ आप भी साहब हवा खाने गये” * ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’! जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन. *… Continue reading हास्य-रस -दो / अकबर इलाहाबादी
हास्य-रस -एक / अकबर इलाहाबादी
दिल लिया है हमसे जिसने दिल्लगी के वास्ते क्या तआज्जुब है जो तफ़रीहन हमारी जान ले शेख़ जी घर से न निकले और लिख कर दे दिया आप बी०ए० पास हैं तो बन्दा बीवी पास है तमाशा देखिये बिजली का मग़रिब और मशरिक़ में कलों में है वहाँ दाख़िल, यहाँ मज़हब पे गिरती है. तिफ़्ल… Continue reading हास्य-रस -एक / अकबर इलाहाबादी
चश्मे-जहाँ से हालते अस्ली छिपी नहीं / अकबर इलाहाबादी
चश्मे जहाँ से हालते असली नहीं छुपती अख्बार में जो चाहिए वह छाप दीजिए दावा बहुत बड़ा है रियाजी मे आपको तूले शबे फिराक को तो नाप दीजिए सुनते नहीं हैं शेख नई रोशनी की बात इंजन कि उनके कान में अब भाप दीजिए जिस बुत के दर पे गौर से अकबर ने कह दिया… Continue reading चश्मे-जहाँ से हालते अस्ली छिपी नहीं / अकबर इलाहाबादी
सूप का शायक़ हूँ यख़नी होगी क्या / अकबर इलाहाबादी
सूप का [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”शौक़ीन”]शायक़[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] हूँ, [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”एक किस्म का शोरबा जो पुलाव पर डाला जाता है”]यख़नी[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] होगी क्या चाहिए कटलेट, यह कीमा क्या करूँ [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”एक लेखक”]लैथरिज[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] की चाहिए, रीडर मुझे शेख़ सादी की [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”शेख़ सादी की एक क़िताब जिसमें ईश्वर का गुणगान किया गया है”]करीमा[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] ,क्या करूँ खींचते हैं हर तरफ़, तानें [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip… Continue reading सूप का शायक़ हूँ यख़नी होगी क्या / अकबर इलाहाबादी
तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब / अकबर इलाहाबादी
तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”गवर्नमेन्ट”]गौरमेन्ट[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] सैयद पे क्यों मेहरबाँ है उसे क्यों हुई इस क़दर कामियाबी कि हर [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”सभा”]बज़्म[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] में बस यही [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”कथा”]दास्ताँ[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] है कभी लाट साहब हैं मेहमान उसके कभी लाट साहब का वह [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”कथा”]मेहमाँ[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] है नहीं है हमारे बराबर वह हरगिज़ दिया हमने हर सीग़े का इम्तहाँ है… Continue reading तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब / अकबर इलाहाबादी
हस्ती के शजर में जो यह चाहो कि चमक जाओ / अकबर इलाहाबादी
हस्ती के शज़र में जो यह चाहो कि चमक जाओ कच्चे न रहो बल्कि किसी रंग मे पक जाओ मैंने कहा कायल मै तसव्वुफ का नहीं हूँ कहने लगे इस बज़्म मे जाओ तो थिरक जाओ मैंने कहा कुछ खौफ कलेक्टर का नहीं है कहने लगे आ जाएँ अभी वह तो दुबक जाओ मैंने कहा… Continue reading हस्ती के शजर में जो यह चाहो कि चमक जाओ / अकबर इलाहाबादी
बिठाई जाएंगी पर्दे में बीबियाँ कब तक / अकबर इलाहाबादी
बिठाई जाएंगी परदे में बीबियाँ कब तक बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”भवन का वह भाग जहाँ स्त्रियाँ रहती हैं;”]हरम-सरा[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] की हिफ़ाज़त को [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”तलवार”]तेग़[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] ही न रही तो काम देंगी यह चिलमन की तितलियाँ कब तक मियाँ से बीबी हैं, परदा है उनको फ़र्ज़ मगर मियाँ का इल्म ही उट्ठा… Continue reading बिठाई जाएंगी पर्दे में बीबियाँ कब तक / अकबर इलाहाबादी
हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह / अकबर इलाहाबादी
हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”जिसका ना कहना ही बेहतर हो”]नागुफ़्ता बेह[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] मौलवी की मौलवी से [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”जान-पहचान”]रूबकारी[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] हो गई एक डिनर में खा गया इतना कि तन से निकली जान ख़िदमते-क़ौमी में बारे [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”जान क़ुर्बान करना”]जाँनिसारी[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] हो गई अपने [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”तबीयत की आवारागर्दी”]सैलाने-तबीयत[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] पर जो की मैंने नज़र आप ही… Continue reading हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह / अकबर इलाहाबादी