बहार आई / अकबर इलाहाबादी

बहार आई, मये-गुल्गूँ के फ़व्वारे हुए जारी यहाँ सावन से बढ़कर साक़िया फागुन बरसता है फ़रावानी हुई दौलत की सन्नाआने योरप में यह अब्रे-दौरे-इंजन है कि जिससे हुन बरसता है

मुझे भी दीजिए अख़बार / अकबर इलाहाबादी

मुझे भी दीजिए अख़बार का वरक़ कोई मगर वह जिसमें दवाओं का इश्तेहार न हो जो हैं शुमार में कौड़ी के तीन हैं इस वक़्त यही है ख़ूब, किसी में मेरा शुमार न हो गिला यह जब्र क्यों कर रहे हो ऐ ’अकबर’ सुकूत ही है मुनासिब जब अख़्तियार न हो

गाँधी तो हमारा भोला है / अकबर इलाहाबादी

गाँधी तो हमारा भोला है, और शेख़ ने बदला चोला है देखो तो ख़ुदा क्या करता है, साहब ने भी दफ़्तर खोला है आनर की पहेली बूझी है, हर इक को तअल्ली सूझी है जो चोकर था वह सूजी है, जो माशा था वह तोला है यारों में रक़म अब कटती है, इस वक़्त हुकूमत… Continue reading गाँधी तो हमारा भोला है / अकबर इलाहाबादी

जिस बात को मुफ़ीद समझते हो / अकबर इलाहाबादी

जिस बात को मुफ़ीद समझते हो ख़ुद करो औरों पे उसका बार न इस्रार से धरो हालात मुख़्तलिफ़ हैं, ज़रा सोच लो यह बात दुश्मन तो चाहते हैं कि आपस में लड़ मरो

मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो / अकबर इलाहाबादी

मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो, हिन्दू की भी ठकुराई न रहे! बन जावो हर इक के बाप यहाँ दावे को कोई भाई न रहे! हम आपके फ़न के गाहक हों, ख़ुद्दाम हमारे हों ग़ायब सब काम मशीनों ही से चले, धोबी न रहे नाई न रहे!

ख़ुदा के बाब में / अकबर इलाहाबादी

ख़ुदा के बाब में क्या आप मुझसे बहस करते हैं ख़ुदा वह है कि जिसके हुक्म से साहब भी मरते हैं मगर इस शेर को मैं ग़ालिबन क़ायम न रक्खूँगा मचेगा गुल, ख़ुदा को आप क्यों बदनाम करते हैं

हास्य-रस -सात / अकबर इलाहाबादी

क्योंकर ख़ुदा के अर्श के क़ायल हों ये अज़ीज़ जुगराफ़िये में अर्श का नक़्शा नहीं मिला क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ जान ही लेने की हिकमत में तरक़्क़ी देखी मौत का रोकने वाला कोई पैदा न हुआ तालीम का शोर ऐसा,… Continue reading हास्य-रस -सात / अकबर इलाहाबादी

हास्य-रस -छ: / अकबर इलाहाबादी

मय भी होटल में पियो,चन्दा भी दो मस्जिद में शेख़ भी ख़ुश रहे, शैतान भी बेज़ार न हो ऐश का भी ज़ौक़ दींदारी की शुहरत का भी शौक़ आप म्यूज़िक हाल में क़ुरआन गाया कीजिये गुले तस्वीर किस ख़ूबी से गुलशन में लगाया है मेरे सैयाद ने बुलबुल को भी उल्लू बनाया है मछली ने… Continue reading हास्य-रस -छ: / अकबर इलाहाबादी

हास्य-रस -पाँच / अकबर इलाहाबादी

फ़िरगी से कहा, पेंशन भी ले कर बस यहाँ रहिये कहा-जीने को आए हैं,यहाँ मरने नहीं आये बर्क़ के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह रौशनी आती है, और नूर चला जाता है काँउंसिल में सवाल होने लगे क़ौमी ताक़त ने जब जवाब दिता हरमसरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही तो काम देंगी… Continue reading हास्य-रस -पाँच / अकबर इलाहाबादी