Akhtar Hoshiarpuri Archive

ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए / अख़्तर होश्यारपुरी

ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए कहीं न घर से गए कारवाँ के होते हुए मैं किस का नाम न लूँ और नाम लूँ किस का हज़ारों फूल खिले थे ख़िज़ाँ के होते हुए बदन कि जैसे हवाओं …

वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था / अख़्तर होश्यारपुरी

वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था दिए की लौ पे सितारों का रक़्स जारी था मैं उस को देखता था दम-ब-ख़ुद था हैराँ था किसे ख़बर वो कड़ा वक़्त कितना भारी था गुज़रते वक़्त ने क्या क्या न चारा …

उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं / अख़्तर होश्यारपुरी

उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं दिए जलें न जलें दाग़ जलते रहते हैं मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र ये लोग वो हैं जो चेहरे बदलते रहते हैं ज़माने को तो हमेशा सफ़र में रहना है जो …

तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ / अख़्तर होश्यारपुरी

तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ शरर तो लपका मगर शोला-ए-सदा न हुआ हमें ज़माने ने क्या क्या न आइने दिखलाए मगर वो अक्स जो आईना-आशना न हुआ बयाज़-ए-जाँ में सभी शेर ख़ूब-सूरत थे किसी भी मिसरा-ए-रंगीं का हाशिया न …

थी तितलियों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी / अख़्तर होश्यारपुरी

थी तितलियों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी वो शहर क्या हुआ जिस की थी हर गली मेरी मैं अपनी ज़ात की तशरीह करता फिरता था न जाने फिर कहाँ आवाज़ खो गई मेरी ये सरगुज़िश्त-ए-ज़माना ये दास्तान-ए-हयात अधूर बात में …

मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया / अख़्तर होश्यारपुरी

मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया सूरज की रौशनी ने बड़ा काम कर दिया हाथों पे मेरे अपने लहू का निशान था लोगों ने उस के क़त्ल का इल्ज़ाम धर दिया गंदुम का बीज पानी की छागल …

मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए / अख़्तर होश्यारपुरी

मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए क्या सफ़र था मेरे सारे ख़्वाब घर में रह गए अब कोई तस्वीर भी अपनी जगह क़ाएम नहीं अब हवा के रंग ही मेरी नज़र में रह गए जितने मंज़र थे मिरे हम-राह …

क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था / अख़्तर होश्यारपुरी

क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था जलता हुआ चराग़ मिरी रह-गुज़र का था हम जब सफ़र पे निकले थे तारों की छाँव थी फिर अपे हम-रिकाब उजाला सहर का था साहिल की गीली रेत ने …

किसे ख़बर जब मैं शहर-ए-जाँ से गुज़र रहा था / अख़्तर होश्यारपुरी

किसे ख़बर जब मैं शहर-ए-जाँ से गुज़र रहा था ज़मीं थी पहलू में सूरज इक कोस पर रहा था हवा में ख़ुशबुएँ मेरी पहचान बन गई थीं मैं अपनी मिट्टी से फूल बन कर उभर रहा था अजीब सरगोशियों का …

ख़्वाहिशें इतनी बढ़ीं इंसान आधा रह गया / अख़्तर होश्यारपुरी

ख़्वाहिशें इतनी बढ़ीं इंसान आधा रह गया ख़्वाब जो देखा नहीं वो अभी अधूरा रह गया मैं तोउस के साथ ही घर से निकल कर आ गया और पीछे एक दस्तक एक साए रह गया उस को तो पैराहनों से …