Gulnar Afrin Archive

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था / ‘गुलनार’ आफ़रीन

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था और तुम्हें दिल से भुला दें ये गवारा भी न था हर तरफ़ तपती हुई धूप थी ऐ उम्र-ए-रवाँ दूर तक दश्त-ए-अलम में कोई साया भी न था मशअल-ए-जाँ भी जलाई …

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा / ‘गुलनार’ आफ़रीन

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा हाथ में वो हाथ ले कर उम्र भर चलता रहा एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया ज़िंदगीं भर मुझ में एक तूफ़ान सा पलता रहा जानती हूँ अब उसे …

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई / ‘गुलनार’ आफ़रीन

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई मेरे दिल का नक़्शा बदल गया मेरी सुब्ह रात में ढल गई वही ज़िंदगी जो बहार नफ़स जो बहर क़दम मेरे साथ थी कभी मेरा साथ भी छोड़ कर …

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है / ‘गुलनार’ आफ़रीन

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है जो दर्द है वो रूह की गहराइयों में है जिस को कभी ख़याल का पैकर ने मिल सका वो अक्स मेरे ज़ेहन की रानाईयों में है कल तक तो ज़िंदगी थी तमाशा बनी …

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा / ‘गुलनार’ आफ़रीन

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा जुदा है सारे ज़माने से रास्ता मेरा गुज़र के आई हूँ मैं ग़म के रेग-ज़ारों से नज़र उदास है दिल है दुखा हुआ मेरा न जाने किस लिए क़ातिल के अश्क भर आए …

न पूछ ऐ मेरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी / ‘गुलनार’ आफ़रीन

न पूछ ऐ मेरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी दिल-ए-हज़ीं में भी आबाद एक दुनिया थी हर इक नज़र थी हमारे ही चाक-दामाँ पर हर एक साअत-ए-ग़म जैसे इक तमाशा थी हमें भी अब दर ओ दीवार घर के याद आए …

हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए / ‘गुलनार’ आफ़रीन

हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए ये दिल तलाश में जिस की है वो नज़र आए न जाने शहर-ए-निगाराँ पे क्या गुज़रती है फ़जा-ए-दश्त-आलम कोई तो ख़बर आए निशान भूल गई हूँ मैं राह-ए-मंज़िल का ख़ुदा करे के मुझे याद-ए-रह-गुज़र …

दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए / ‘गुलनार’ आफ़रीन

दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए याद ग़म के हमें कुछ और भी पहलू आए ज़ुल्मत-ए-शब में है रू-पोश निशान-ए-मंज़िल अब मुझे राह दिखाने कोई जुगनू आए दिल का ही ज़ख़्म तेरी याद का इक फूल बने …

आँसू भी वही कर्ब के साए भी वही हैं / ‘गुलनार’ आफ़रीन

आँसू भी वही कर्ब के साए भी वही हैं हम गर्दिश-ए-दौराँ के सताए भी वही हैं क्या बात है क्यूँ शहर में अब जी नहीं लगता हालांकि यहाँ अपने पराए भी वही हैं औराक़-ए-दिल-ओ-जाँ पे जिन्हें तुम ने लिखा है …

आँख में अश्क लिए ख़ाक लिए दामन में / ‘गुलनार’ आफ़रीन

आँख में अश्क लिए ख़ाक लिए दामन में एक दीवाना नज़र आता है कब से बन में मेरे घर के भी दर ओ बाम कभी जागेंगे धूप निकलेगी कभी तो मेरे भी आँगन में कहिए आईना-ए-सद-फ़स्ल-ए-बहाराँ तुझ को कितने फूलों …