इतने पलाश क्यों फूट पड़े है एक साथ इनको समेटने को इतने आँचल भी तो चाहिए, ऐसी कतार लौ की दिन-रात जलेगी जो किस-किस की पुतली से क्या-क्या कहिए। क्या आग लग गई है पानी में डालों पर प्यासी मीनों की भीड़ लग गई है, नाहक इतनी भूबरि धरती ने उलची है फागुन के स्वर… Continue reading अंगारे और धुआँ / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
Author: poets
सहमते स्वर-5 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मैं राजदरबार से चला आया अपनी ही नज़रों में गिरने से बच गया। नए माहौल में भटकना भला लगता है सुविधा का भरण क्षण तो सड़ा-गला लगता है उनकी क्या करता हाँ-हज़ूरी जो ख़ुद मोहताज हैं
सहमते स्वर-4 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
मैं नहीं जाता किसी के द्वार बिना मनुहार अथवा समय की पुकार के अनमांगा दण्डकारण्य भी फलता है लंका का स्वर्ण सिर्फ़ जलता है- जलता है!
सहमते स्वर-3 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
आज मैंने सुई में डोरा डाल लिया उतनी ही बड़ी सिद्धि जितनी जग जाती एक कविता लिख लेने में। विगत अड़तालीस वर्षों से तुमने मुझे ऐसा निकम्मा बना दिया कि कुरता-कमीज़ में बटन तक टाँकने का सीखा सलीका नहीं। कुछ भी करो हँसने का मौक़ा तो न दो औरों को। तुम्हें ही दोषी ठहराएंगी पीढ़ियाँ… Continue reading सहमते स्वर-3 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
सहमते स्वर-2 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
जीवन का नया दौर शुरू हुआ बची-खुची साँसों को जीने की बेचैनी ख़ूब ग्रह हैं मेरे भी एक दिन काशी छोड़ मालवा जा पहुँचा था महामना मालवीय का कर्ज़ा चुकाने को, लखनऊ बसने की बात स्वप्न में भी नहीं सोची, बचपन में सुनता था परदादा चंदिका सिंह यहीं कहीं खेत रहे भारत के पहले स्वतन्त्रता-संग्राम… Continue reading सहमते स्वर-2 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
सहमते स्वर-1 / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
जन्मा उन्नाव में मालवा में जा बसा लखनऊ लौटा तो नए नखत टँके दिखे वक़्त के गरेबाँ में। अनायास याद आई बूढ़ी जीवन संगिनी की जिसका सब रस लेकर आज भी मैं छलक रहा
मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
घर-आंगन में आग लग रही। सुलग रहे वन -उपवन, दर दीवारें चटख रही हैं जलते छप्पर- छाजन। तन जलता है , मन जलता है जलता जन-धन-जीवन, एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बंधन। दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगानेवाला, मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला। भाई की गर्दन पर भाई का तन… Continue reading मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज हृदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार… Continue reading तूफानों की ओर घुमा दो नाविक / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
वरदान माँगूँगा नहीं / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
यह हार एक विराम है जीवन महासंग्राम है तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं। वरदान माँगूँगा नहीं।। स्मृति सुखद प्रहरों के लिए अपने खंडहरों के लिए यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं। वरदान माँगूँगा नहीं।। क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संधर्ष पथ पर जो… Continue reading वरदान माँगूँगा नहीं / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
हम पंछी उन्मुक्त गगन के / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे… Continue reading हम पंछी उन्मुक्त गगन के / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’