ऊधव को उपदेश सुनो ब्रज-नागरी रूप सील लावण्य सबै गुन आगरी प्रेम-धुजा रस रुपिनी, उपजावत सुख पुंज सुन्दरस्याम विलासिनी, नववृन्दावन कुंज सुनो ब्रज-नागरी कहन स्याम संदेस एक मैं तुम पे आयौ कहन समै संकेत कहूँ अवसर नहिं पायौ सोचत हीं मन में रह्यों,कब पाऊँ इक ठाऊँ कहि संदेस नंदलाल को, बहुरि मधुपुरी जाऊँ सुनो ब्रज-नागरी… Continue reading ऊधव के उपदेश सुनो ब्रज नागरी / नंददास
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रुचिर चित्रसारी सघन कुंज में मध्य कुसुम-रावटी राजै / नंददास
(राग विहाग) रुचिर चित्रसारी सघन कुंज में मध्य कुसुम-रावटी राजै । चंदन के रूख चहुँ ओर छवि छाय रहे, फूलन के अभूषन-बसन, फूलन सिंगार सब साजै ॥ सीयर तहखाने में त्रिविध समीर सीरी, चंदन के बाग मध चंदन-महल छाजै । नंददास प्रिया-प्रियतम नवल जोरि, बिधना रची बनाय, श्री ब्रजराज विराजै ॥
तपन लाग्यौ घाम, परत अति धूप भैया / नंददास
(राग सारंग) तपन लाग्यौ घाम, परत अति धूप भैया, कहँ छाँह सीतल किन देखो । भोजन कूँ भई अबार, लागी है भूख भारी, मेरी ओर तुम पेखो ॥ बर की छैयाँ, दुपहर की बिरियाँ, गैयाँ सिमिट सब ही जहँ आवै । ’नंददास’ प्रभु कहत सखन सों, यही ठौर मेरे जीय भावै ॥
आज वृंदाविपिन कुंज अद्भुत नई / नंददास
(राग सारंग) आज वृंदाविपिन कुंज अद्भुत नई । परम सीतल सुखद स्याम सोभित तहाँ, माधुरी मधुर और पीत फूलन छई ॥ विविध कदली खंभ, झूमका झुक रहे, मधुप गुंजार, सुर कोकिला धुनि ठई । तहाँ राजत श्री वृषभान की लाड़िली, मनों हो घनस्याम ढिंग उलही सोभा नई ॥ तरनि-तनया-तीर धीर समीर जहाँ, सुनत ब्रजबधू अति… Continue reading आज वृंदाविपिन कुंज अद्भुत नई / नंददास
छोटो सो कन्हैया एक मुरली मधुर छोटी / नंददास
छोटो सो कन्हैया एक मुरली मधुर छोटी, छोटे-छोटे सखा संग छोटी पाग सिर की। छोटी सी लकुटि हाथ छोटे वत्स लिए साथ, छोटी कोटि छोटी पट छोटे पीताम्बर की॥ छोटे से कुण्डल कान, मुनिमन छुटे ध्यान, छोटी-छोटी गोपी सब आई घर-घर की। ‘नंददास प्रभु छोटे, वेद भाव मोटे-मोटे, खायो है माखन सोभा देखहुँ बदन की॥… Continue reading छोटो सो कन्हैया एक मुरली मधुर छोटी / नंददास
कनुप्रिया – समापन / धर्मवीर भारती
क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु ? लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी ! इसी लिए तब मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी, इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था तुम्हारे गोलोक का कालावधिहीन रास, क्योंकि मुझे फिर आना था ! तुमने मुझे पुकारा था न मैं आ गई… Continue reading कनुप्रिया – समापन / धर्मवीर भारती
कनुप्रिया – समुद्र-स्वप्न / धर्मवीर भारती
जिसकी शेषशय्या पर तुम्हारे साथ युगों-युगों तक क्रीड़ा की है आज उस समुद्र को मैंने स्वप्न में देखा कनु! लहरों के नीले अवगुण्ठन में जहाँ सिन्दूरी गुलाब जैसा सूरज खिलता था वहाँ सैकड़ों निष्फल सीपियाँ छटपटा रही हैं – और तुम मौन हो मैंने देखा कि अगणित विक्षुब्ध विक्रान्त लहरें फेन का शिरस्त्राण पहने सिवार… Continue reading कनुप्रिया – समुद्र-स्वप्न / धर्मवीर भारती
कनुप्रिया – शब्द : अर्थहीन / धर्मवीर भारती
पर इस सार्थकता को तुम मुझे कैसे समझाओगे कनु? शब्द, शब्द, शब्द……. मेरे लिए सब अर्थहीन हैं यदि वे मेरे पास बैठकर मेरे रूखे कुन्तलों में उँगलियाँ उलझाए हुए तुम्हारे काँपते अधरों से नहीं निकलते शब्द, शब्द, शब्द……. कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व…….. मैंने भी गली-गली सुने हैं ये शब्द अर्जुन ने चाहे इनमें कुछ भी… Continue reading कनुप्रिया – शब्द : अर्थहीन / धर्मवीर भारती
कनुप्रिया – एक प्रश्न / धर्मवीर भारती
अच्छा, मेरे महान् कनु, मान लो कि क्षण भर को मैं यह स्वीकार लूँ कि मेरे ये सारे तन्मयता के गहरे क्षण सिर्फ भावावेश थे, सुकोमल कल्पनाएँ थीं रँगे हुए, अर्थहीन, आकर्षक शब्द थे – मान लो कि क्षण भर को मैं यह स्वीकार कर लूँ कि पाप-पुण्य, धर्माधर्म, न्याय-दण्ड क्षमा-शील वाला यह तुम्हारा युद्ध… Continue reading कनुप्रिया – एक प्रश्न / धर्मवीर भारती
कनुप्रिया – अमंगल छाया / धर्मवीर भारती
घाट से आते हुए कदम्ब के नीचे खड़े कनु को ध्यानमग्न देवता समझ, प्रणाम करने जिस राह से तू लौटती थी बावरी आज उस राह से न लौट उजड़े हुए कुंज रौंदी हुई लताएँ आकाश पर छायी हुई धूल क्या तुझे यह नहीं बता रहीं कि आज उस राह से कृष्ण की अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ… Continue reading कनुप्रिया – अमंगल छाया / धर्मवीर भारती