कला-2 / भवानीप्रसाद मिश्र

कोई अलौकिक ही कला हो किसी के पास तो अलग बात है नहीं तो साधारणतया कलाकार को तो लौकिक का ही सहारा है लौकिक के सहारे लोकोपयोगी रचना ही करनी है और ऐसा करते-करते जितनी अलौकिकता आ जाए उतनी अपने भीतर भरनी है कई लोग लोगों को किसी खाई की तरफ़ ले जाएँ ऐसी कुछ… Continue reading कला-2 / भवानीप्रसाद मिश्र

कला-1 / भवानीप्रसाद मिश्र

कला वह है जो सत्य के अनुरूप हो और उठानेवाली हो हमारी पीढ़ियों को यों तो हर लापरवाह साधन बना सकता है गिरने का सीढ़ियों को !

देखो कि / भवानीप्रसाद मिश्र

रात को दिन को अकेले में और मेले में तुम गुनगुनाते रहना क्योंकि देखो गुनगुना रही हैं वहाँ मधुमक्खियाँ नीम के फूलों को चूसते हुए और महक रहे हैं नीम के फूल ज़्यादा-ज़्यादा देकर मधुमक्खियों को रस !

आँखें बोलेंगी / भवानीप्रसाद मिश्र

जीभ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कहकर या बोलकर मन की बातें ज़ाहिर करने की सूरत नहीं है हम बोलेंगे नहीं अब घूमेंगे-भर खुले में लोग आँखें देखेंगे हमारी आँखें हमारी बोलेंगी बेचैनी घोलेंगी हमारी आँखें वातावरण में जैसे प्रकृति घोलती है प्रतिक्षण जीवन करोड़ों बरस के आग्रही मरण में और सुगबुगाना पड़ता है उसे… Continue reading आँखें बोलेंगी / भवानीप्रसाद मिश्र

गीत-आघात / भवानीप्रसाद मिश्र

तोड़ रहे हैं सुबह की ठंडी हवा को फूट रही सूरज की किरनें और नन्हें-नन्हें पंछियों के गीत मज़दूरों की काम पर निकली टोलियों को किरनों से भी ज़्यादा सहारा गीतों का है शायद नहीं तो कैसे निकलते वे इतनी ठंडी हवा में !

अधूरे ही / भवानीप्रसाद मिश्र

अधूरे मन से ही सही मगर उसने तुझसे मन की बात कही पुराने दिनों के अपने अधूरे सपने तेरे क़दमों में ला रखे उसने तो तू भी सींच दे उसके तप्त शिर को अपने आंसुओं से डाल दे उस पर अपने आँचल की छाया क्योंकि उसके थके – मांदे दिनों में भी उसे चाहिए एक… Continue reading अधूरे ही / भवानीप्रसाद मिश्र

शून्य होकर / भवानीप्रसाद मिश्र

शून्य होकर बैठ जाता है जैसे उदास बच्चा उस दिन उतना अकेला और असहाय बैठा दिखा शाम का पहला तारा काफ़ी देर तक नहीं आये दूसरे तारे और जब आये तब भी ऐसा नहीं लगा पहले ने उन्हें महसूस किया है या दूसरों ने पहले को!

काफ़ी दिन हो गये / भवानीप्रसाद मिश्र

काफ़ी दिन हो गये लगभग छै साल कहो तब से एक कोशिश कर रहा हूँ मगर होता कुछ नहीं है काम शायद कठिन है मौत का चित्र खींचना मैंने उसे सख्त ठण्ड की एक रात में देखा था नंग–धडंग नायलान के उजाले में खड़े न बड़े दाँत न रूखे केश न भयानक चेहरा ख़ूबसूरती का… Continue reading काफ़ी दिन हो गये / भवानीप्रसाद मिश्र

क्या हर्ज़ है / भवानीप्रसाद मिश्र

क्या हर्ज़ है अगर अब विदा ले लें हम एक सपने से जो तुमने भी देखा था और मैंने भी दोनों के सपने में कोई भी फ़र्क नहीं था ऐसा तो नहीं कहूँगा फ़र्क था मगर तफ़सील -भर का मूलतः सपना एक ही था शुरू हुआ था वह एक ही समय एक ही जगह एक… Continue reading क्या हर्ज़ है / भवानीप्रसाद मिश्र

अपने आपमें / भवानीप्रसाद मिश्र

अपने आप में एक ओछी चीज़ है समय चीजों को टोड़ने वाला मिटाने वाला बने- बनाये महलों मकानों देशों मौसमों और ख़यालों को मगर आज सुबह से पकड़ लिये हैं मैंने इस ओछे आदमी के कान और वह मुझे बेमन से ही सही मज़ा दे रहा है दस – पंद्रह मिनिट सुख से बैठकर अकेले… Continue reading अपने आपमें / भवानीप्रसाद मिश्र