साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / अष्ठम सर्ग / पृष्ठ ७

मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा,
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा।
देवों की ही चिरकाल नहीं चलती है,
दैत्यों की भी दुर्वृत्ति यहाँ फलती है।”
हँस पड़े देव केकयी-कथन यह सुन कर,
रो दिये क्षुब्ध दुर्दैव दैत्य सिर धुनकर!
“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का,
बल दिया उसी ने भूल मान लेने का।
अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे;
मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे।
होने पर बहुधा अर्द्ध रात्रि अन्धेरी
जीजी आकर करतीं पुकार थीं मेरी–
’लो कुहकिनि, अपना कुहक, राम यह जागा,
निज मँझली माँ का स्वप्न देख उठ भागा!’
भ्रम हुआ भरत पर मुझे व्यर्थ संशय का,
प्रतिहिंसा ने ले लिया स्थान तब भय का।
तुम पर भी ऐसी भ्रान्ति भरत से पाती
तो उसे मनाने भी न यहाँ मैं आती!–
जीजी ही आतीं, किन्तु कौन मानेगा?
जो अन्तर्यामी, वही इसे जानेगा।”

“हे अम्ब, तुम्हारा राम जानता है सब,
इस कारण वह कुछ खेद मानता है कब?”
“क्या स्वाभिमान रखती न केकयी रानी?
बतलादे कोई मुझे उच्चकुल-मानी।
सहती कोई अपमान तुम्हारी अम्बा?
पर हाय, आज वह हुई निपट नालम्बा।
मैं सहज मानिनी रही, वही क्षत्राणी,
इस कारण सीखी नहीं दैन्य यह वाणी।
पर महा दीन हो गया आज मन मेरा,
भावज्ञ, सहेजो तुम्हीं भाव-धन मेरा।
समुचित ही मुझको विश्व-घृणा ने घेरा,
समझाता कौन सशान्ति मुझे भ्रम मेरा?
यों ही तुम वन को गये, देव सुरपुर को,
मैं बैठी ही रह गई लिए इस उर को!
बुझ गई पिता की चिता भरत-भुजधारी,
पितृभूमि आज भी तप्त तथापि तुम्हारी।
भय और शोक सब दूर उड़ाओ उसका,
चलकर सुचरित, फिर हृदय जुड़ाओ उसका।
हो तुम्हीं भरत के राज्य, स्वराज्य सम्हालो;
मैं पाल सकी न स्वधर्म, उसे तुम पालो।
स्वामी को जीते जी न दे सकी सुख मैं,
मर कर तो उनको दिखा सकूँ यह मुख मैं।
मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा,
पर भरत-वाक्य है–सहूँ विश्व की व्रीड़ा।
जीवन-नाटक का अन्त कठिन है मेरा,
प्रस्ताव मात्र में जहाँ अधैर्य अँधेरा।
अनुशासन ही था मुझे अभी तक आता,
करती है तुमसे विनय आज यह माता।”

“हा मातः, मुझको करो न यों अपराधी,
मैं सुन न सकूँगा बात और अब आधी।
कहती हो तुम क्यों अन्य-तुल्य यह वाणी;
क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं वह मानी?
इस भाँति मना कर हाय, मुझे न रुठाओ,
जो उठूँ न मैं, क्यों तुम्हीं न आप उठाओ।
वे शैशव के दिन आज हमारे बीते,
माँ के शिशु क्यों शिशु ही न रहे मनचीते?
तुम रीझ-खीझ कर कोप जनातीं मुझको,
हँस आप रुठातीं, आप मनातीं मुझको।
वे दिन बीते, तुम जीर्ण दुःख की मारी,
मैं बड़ा हुआ अब और साथ ही भारी।
अब उठा सकोगी तुम न तीन में कोई,”
“तुम हलके कब थे”-हँसी केकयी, रोई!
“माँ, अब भी तुमसे राम विनय चाहेगा?
अपने ऊपर क्या आप अद्रि ढाहेगा?
अब तो आज्ञा की अम्ब, तुम्हारी वारी,
प्रस्तुत हूँ मैं भी धर्मधनुर्धृतिधारी।
जननी ने मुझको जना, तुम्हीं ने पाला,
अपने साँचे में आप यत्न से ढाला।
सब के ऊपर आदेश तुम्हारा मैया,
मैं अनुचर पूत; सपूत, प्यार का भैया।
वनवास लिया है मान तुम्हारा शासन,
लूँगा न प्रजा का भार, राज-सिंहासन?
पर यह पहला आदेश प्रथम हो पूरा,
वह तात-सत्य भी रहे न अम्ब, अधूरा,
जिस पर हैं अपने प्राण उन्होंने त्यागे;
मैं भी अपना व्रत-नियम निबाहूँ आगे।
निष्फल न गया माँ, यहाँ भरत का आना,
सिरमाथे मैंने वचन तुम्हारा माना।
सन्तुष्ट मुझे तुम देख रही हो वन में,
सुख धन-धरती में नहीं, किन्तु निज मन में।
यदि पूरा प्रत्यय न हो तुम्हें इस जन पर,
तो चढ़ सकते हैं राजदूत तो घन पर!”

“राघव, तेरे ही योग्य कथन है तेरा,
दृढ़ बाल-हठी तू वही राम है मेरा।
देखें हम तेरा अवधि-मार्ग सब सह कर।”
कौसल्या चुप हो गई आप यह कह कर।
ले एक साँस रह गई सुमित्रा भोली,
कैकेयी ही फिर रामचन्द्र से बोली–
“पर मुझको तो परितोष नहीं है इससे,
हा! तब तक मैं क्या कहूँ सुनूँगी किससे?”
“जीती है अब भी अम्ब, उर्मिला बेटी;
इन चरणों की चिरकाल रहूँ मैं चेटी।”
“रानी, तू ने तो रुला दिया पहले ही,
यह कह काँटों पर सुला दिया पहले ही!
आ, मेरी सबसे अधिक दुःखिनी, आ जा,
पिस मुझसे चंदन-लता मुझी पर छा जा!

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