जी है जुगनू-सी ज़िंदगी हमने / हंसराज ‘रहबर’

जी है जुगनू-सी ज़िंदगी हमने
दी अँधेरों को रोशनी हमने ।

लब सिले थे ख़मोश थी महफ़िल
अनकही बात तब कही हमने ।

सच के बदले मिली जो बदनामी
वो भी झेली ख़ुशी-ख़ुशी हमने ।

ज़ख़्म पर जो नमक छिड़कते थे,
उनसे कर ली थी दोस्ती हमने ।

जिसमें नफ़रत भरी जहालत थी
ख़ूब देखी है वह हँसी हमने ।

शक्ल-सूरत से आदमी थे वो
जिनको समझा था आदमी हमने ।

हर ज़बाँ पर है वाह वा ‘रहबर’
आँख देखी ग़ज़ल कही हमने ।

(15.07.1989, दिल्ली)

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