जहाँ तक सवाल है / लक्ष्मी नारायण सुधाकर

जहाँ तक सवाल है शोषितों के हाल का
फँसे हुए सदियों से शोषकों के जाल में
निगल न पाये पर छोड़ भी तो नहीं रहे
पिसे जा रहे हैं क्रूर काल ही के गाल में
ऊँच-नीच, छूट-छात, जाति-पात कीच-बीच
वारि बिन मीन अकुलाति जिमि ताल में
‘सुधाकर’ स्वतन्त्र भले भारत हुआ है बन्धु
शोषित स्वतन्त्र जाने होंगे किस काल में

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