एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती / श्रीप्रकाश शुक्ल

एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती
वह जब भी घर से निकलती है
अपने साथ घर की पूरी खतौनी लेकर निकलती है

अचानक उसे याद आता है
गैस का जलना
दरवाज़े का खुला रहना
नल का टपकना और दूध का दहकना

एक-एक कर वह पूछती है
प्रेस तो बंद कर दिया था न !
आँगन का दरवाज़ा तो लगा दिया था न !
किचेन का सीधा वाला नल बंद करना तो नहीं भूली !

अरे ! हाँ ! वो सब्ज़ी
वह मँहगी हरी पत्तियों वाली सब्ज़ी
जो अभी कल ही तो लाई थी सटटी से
प्लास्टिक से निकाल दिया था न !

हाँ, हाँ अरे सब तो ठीक है
आपको ध्यान है आलमारी लाक करना तो नहीं भूली
अभी कल की ही तो बात है महीनों को बचाए पैसे से नाक की कील ख़रीदी थी ।

इस तरह वह बार-बार याद करती और परेशान होती है
कि दूध वाले को मना करना भूल गई
कि बरतन वाली से कहना भूल गई कि उसे कल नहीं आना था
कि पड़ोसिन को बता ही देना था कि कभी कभी मेरे घर को भी झाँक लिया करतीं ।

इस तरह एक स्त्री निकलती है घर से
जैसे निकलना ही उसका होना है घर में ।

(25.09.2011)

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