आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ / ‘जिगर’ बरेलवी

आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ
अब कहाँ वो बादिया-पैमाइयाँ

जोश-ए-तूफाँ है न मौंजों का ख़रोश
अब लिए है गोद में गहराइयाँ

खेलते थे ज़िंदगी ओ मौत से
वो शबाब और आह वो कजराइयाँ

हम हैं सन्नाटा है और महवियतें
रात है और रूह की गहराइयाँ

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