Jigar Barelvi Archive

अपने ही सजद का है शौक मेरे सर-ए-नियाज़ में / ‘जिगर’ बरेलवी

अपने ही सजद का है शौक मेरे सर-ए-नियाज़ में काबा-ए-दिल है महव हूँ नमाज़ में पिंहाँ है गर ख़ाक डाल दीदा-ए-इम्तियाज़ में जाम ओ ख़म ओ सबू न देख मय-कदा-ए-मजाज़ में किस का फ़रोग-ए-अक्स है कौन महव-ए-नाज़ में कौंद पही …

आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ / ‘जिगर’ बरेलवी

आह हम हैं और शिकस्ता-पाइयाँ अब कहाँ वो बादिया-पैमाइयाँ जोश-ए-तूफाँ है न मौंजों का ख़रोश अब लिए है गोद में गहराइयाँ खेलते थे ज़िंदगी ओ मौत से वो शबाब और आह वो कजराइयाँ हम हैं सन्नाटा है और महवियतें रात …