देखत कै वृच्छन में / गँग

देखत कै वृच्छन में दीरघ सुभायमान, कीर चल्यो चाखिबे को प्रेम जिय जग्यो है. लाल फल देखि कै जटान मँड़रान लागे, देखत बटोही बहुतेरे डगमग्यो है. गंग कवि फल फूटे भुआ उधिराने लखि, सबही निरास ह्वै कै निज गृह भग्यो है. ऐसो फलहीन वृच्छ बसुधा में भयो, यारो, सेंमर बिसासी बहुतेरन को ठग्यो है.

झुकत कृपान मयदान ज्यों / गँग

झुकत कृपान मयदान ज्यों उदोत भान, एकन ते एक मान सुषमा जरद की. कहै कवि गंग तेरे बल को बयारि लगे, फूटी गजघटा घनघटा ज्यों सरद की. एन मान सोनित की नदियाँ उमड़ चलीं, रही न निसानी कहूँ महि में गरद की. गौरी गह्यो गिरिपति, गनपति गह्यो गौरी, गौरीपति गही पूँछ लपकि बरद की.

बैठी थी सखिन संग / गँग

बैठी थी सखिन सँग,पिय को गवन सुन्यौ , सुख के समूह में बियोग आगि भरकी. गंग कहै त्रिविध सुगंध कै पवन बह्यो, लागत ही ताके तन भई बिथा जर की. प्यारी को परसि पौन गयो मानसर कहूँ , लागत ही औरे गति भई मानसर की. जलचर चरे औ सेवार जरि छार भयो, तल जरि गयो,पंक… Continue reading बैठी थी सखिन संग / गँग

चकित भँवरि रहि गयो / गँग

चकित भँवरि रहि गयो, गम नहिं करत कमलवन, अहि फन मनि नहिं लेत, तेज नहिं बहत पवन वन। हंस मानसर तज्यो चक्क चक्की न मिलै अति, बहु सुंदरि पदिमिनी पुरुष न चहै, न करै रति। खलभलित सेस कवि गंग भन, अमित तेज रविरथ खस्यो, खानान खान बैरम सुवन जबहिं क्रोध करि तंग कस्यो॥ कहा जाता… Continue reading चकित भँवरि रहि गयो / गँग

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै / गँग

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥ कवि ‘गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की। जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकब्बर की॥

रती बिन साधु, रती बिन संत / गँग

रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥ रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको। ‘गंग कहै सुन साह अकब्बर, एक रती बिन पाव रती को॥ एक को छोड बिजा को भजै, रसना जु कटौ उस लब्बर की।

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में / गँग

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई। केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥ मोगरे माहिं लपेटि धरी ‘गंग बास सुबास न आव न आई। ऐसेहि नीच को ऊँच की संगति, कोटि करौ पै कुटेव न जाई॥

करि कै जु सिंगार अटारी चढी / गँग

करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो। सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥ कर तें इक कंकन छूटि परयो, सिढियाँ सिढियाँ सिढियाँ बहक्यो। कवि ‘गंग भनै इक शब्द भयो, ठननं ठननं ठननं ठहक्यो॥

मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै / गँग

मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही। सुचि चीकनी चारु चुभी चित में, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥ कवि ‘गंग’ जू या उपमा जो कियो, लखि सूरति या स्रुति गोइ रही। मनो कंचन के कदली दल पै, अति साँवरी साँपिन सोइ रही॥

उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी / गँग

उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी , नेसुक देखाय मुख दूनो दुख दै गई । मुरि मुसकाय अब नेकु ना नजरि जोरै , चेटक सो डारि उर औरै बीज बै गई । कहै कवि गंग ऎसी देखी अनदेखी भली , पेखै न नजरि में बिहाल बाल कै गई । गाँसी ऎसी आँखिन सों आँसी आँसी… Continue reading उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी / गँग