Gang Archive

हहर हवेली सुनि सटक समरकंदी / गँग

हहर हवेली सुनि सटक समरकंदी, धीर न धरत धुनि सुनत निसाना की। मछम को ठाठ ठठ्यो प्रलय सों पटलबौ ‘गंग’, खुरासान अस्पहान लगे एक आना की। जीवन उबीठे बीठे मीठे-मीठे महबूबा, हिए भर न हेरियत अबट बहाना की। तोसखाने, फीलखाने, …

नवल नवाब खानख़ाना जू तिहारी त्रास / गँग

नवल नवाब खानख़ाना जू तिहारी त्रास, भागे देश पति धुनि सुनत निसान की। गंग कहै तिनहूं की रानी रजधानी छाँड़ि, फिरै बिललानी सुधि भूली खान-पान की। तेऊ मिली करिन हरिन मृग बानरानी, तिनहूं की भली भई रच्छा तहाँ प्रान की। …

देखत कै वृच्छन में / गँग

देखत कै वृच्छन में दीरघ सुभायमान, कीर चल्यो चाखिबे को प्रेम जिय जग्यो है. लाल फल देखि कै जटान मँड़रान लागे, देखत बटोही बहुतेरे डगमग्यो है. गंग कवि फल फूटे भुआ उधिराने लखि, सबही निरास ह्वै कै निज गृह भग्यो …

झुकत कृपान मयदान ज्यों / गँग

झुकत कृपान मयदान ज्यों उदोत भान, एकन ते एक मान सुषमा जरद की. कहै कवि गंग तेरे बल को बयारि लगे, फूटी गजघटा घनघटा ज्यों सरद की. एन मान सोनित की नदियाँ उमड़ चलीं, रही न निसानी कहूँ महि में …

बैठी थी सखिन संग / गँग

बैठी थी सखिन सँग,पिय को गवन सुन्यौ , सुख के समूह में बियोग आगि भरकी. गंग कहै त्रिविध सुगंध कै पवन बह्यो, लागत ही ताके तन भई बिथा जर की. प्यारी को परसि पौन गयो मानसर कहूँ , लागत ही …

चकित भँवरि रहि गयो / गँग

चकित भँवरि रहि गयो, गम नहिं करत कमलवन, अहि फन मनि नहिं लेत, तेज नहिं बहत पवन वन। हंस मानसर तज्यो चक्क चक्की न मिलै अति, बहु सुंदरि पदिमिनी पुरुष न चहै, न करै रति। खलभलित सेस कवि गंग भन, …

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै / गँग

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥ कवि ‘गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की। जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकब्बर की॥

रती बिन साधु, रती बिन संत / गँग

रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥ रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको। ‘गंग कहै सुन साह अकब्बर, एक रती बिन पाव रती को॥ एक को छोड बिजा को …

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में / गँग

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई। केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥ मोगरे माहिं लपेटि धरी ‘गंग बास सुबास न आव न आई। ऐसेहि नीच को ऊँच की संगति, कोटि …

करि कै जु सिंगार अटारी चढी / गँग

करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो। सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥ कर तें इक कंकन छूटि परयो, सिढियाँ सिढियाँ सिढियाँ बहक्यो। कवि ‘गंग भनै इक शब्द भयो, ठननं ठननं …