इससे पहले कि / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

सूरज के डूबने और उगने के बीच मैं तैयार कर लेना चाहता हूँ रौशनी के मुट्ठी भर बीज जिन्हें सवेरा होते ही दफना सकूँ मैं धरती के सबसे उर्वर हिस्से में गोद लेना चाहता हूँ कविता के कुछ नए शब्द उम्मीद और ताकत से भरे हुए जिन्हें आने वाली पीढ़ी की नर्म हथेली पर छोड़… Continue reading इससे पहले कि / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

बाज़ार / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

ज़िंदा रहेंगे वे लोग ही जिनके गले में टंगा होगा महँगा प्राइस-टैग ज़िन्दा रहेंगे वे लड़के-लडकियाँ ही जो बाज़ारू भाषा में नाचना-मटकना मुस्कुराना और तुतलाना सीखेंगे ज़िन्दा रहेंगी वही झीलें,नदियाँ और पोखर जो बोतल-बंद पानी उद्योग के लिए काम के सिद्ध होंगे ज़िन्दा रहेंगे वे पहाड़ और समंदर ही जो नंगे टूरिस्टों की भीड़ जुटाने… Continue reading बाज़ार / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

एकाकी / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

जब मैं तुम्हारा साथ पाने के लिए कह रहा था कि मैं अकेला हूँ अकेला नहीं था शायद उस वक़्त भी, मेरी दो बाजुओं पर पुरवैया और पछियाव आसमान में उड़ते सुग्गों की तरह आकर सुस्ताते थे सिर पर ठुड्डी टिकाता था सूरज और पृथ्वी चलती थी अपनी धुरी पर फुदकती हुई मेरे साथ, लेकिन… Continue reading एकाकी / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

जब तुम चली जाओगी / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

जब तुम चली जाओगी तुम्हारी गली में सूरज तब भी उगेगा यथावत, चाँद सही समय पर दस्तक देना नहीं भूलेगा, फूल खिलना नहीं छोड़ देंगे, हवाओं में ताजगी तब भी बनी रहेगी, बच्चे तुम्हारे घर के नीचे वैसे ही खेलते मिला करेंगे पड़ोस के अंकल-आंटी ठीक पहले की तरह झगड़ते रहेंगे, अखबार वाला बिना नागा… Continue reading जब तुम चली जाओगी / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

जुगनू / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

तुम्हारी आँखों के जुगनू एक दिन मैंने अपनी पलकों में कैद कर लिए उस दिन से रात कभी हुई ही नहीं..

अबोध / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

प्यार करने वाले अबोध भेड़ शावकों की तरह होते हैं कसाई की गोद में भी चढ़ जाते हैं और आदत से मजबूर बेचारे भेडिये की थूथन से भी नाक सटाकर प्यार सूंघने लगते हैं….

लडकियाँ / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

कुछ चीजें कभी समझ नहीं आतीं जैसे कि लड़कियों को सिर्फ वही लड़के क्यों बहुत भाते हैं जो उनसे बहुत दूर चले जाते हैं जैसे कि लडकियां अकेले में ही इतना सुरीला क्यों गातीं हैं और क्यों नाचती हैं भरी दुपहरियों में बंद कमरे में जादूभरा नाच जैसे कि लडकियां काजल और चश्मों के पीछे… Continue reading लडकियाँ / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

स्थगित जीवन / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

साँसों में चढ़ता उतरता है पल पल महज़ एक शून्य, कदम लड़खड़ाते घिसटते चलते हैं बाढ़ में डूबे एक अदृश्य पथ पर, लगता है कि जैसे किसी असावधान पल में आकाश का विराट अकेलापन ही पी गए, और पता नहीं क्यों, एक अच्छे जीवन की चाह में इतना लम्बा स्थगित जीवन जी गए..

सवाल यह नहीं था… / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

सवाल प्यार करने या न करने का नहीं था दोस्त सवाल किसी हाँ या न का भी नहीं था सवाल तो यह था कि उन आखों में हरियाली क्यूँ नहीं थी और क्यूँ नहीं थी वहां खामोश पत्थरों की जगह एक बुडावदार झील? सवाल मिलने या न मिलने का नहीं था दोस्त सवाल ख़ुशी और… Continue reading सवाल यह नहीं था… / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

एक पैसे में… / घनश्याम कुमार ‘देवांश’

सुबह बहुत उदास थी और मेरे भाड़े के कमरे में धूप के तंतु ओढ़े दूर तक पसर आई थी कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था दरवाज़े के बाहर की चिड़िया भी रेलिंग पर हिलती डुलती खामोश बैठी थी और हवा का संवादहीन शोर एक निरर्थक सायरन की तरह बज रहा था जबकि मैं… Continue reading एक पैसे में… / घनश्याम कुमार ‘देवांश’