कलह-कारण / सुभद्राकुमारी चौहान

कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने। पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥ तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने। पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी॥ उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया। मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं॥ कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में… Continue reading कलह-कारण / सुभद्राकुमारी चौहान

चलते समय / सुभद्राकुमारी चौहान

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’? मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो! ’जा…’ कहते रुकती है जबान किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!! सेवा करना था जहाँ मुझे कुछ भक्ति-भाव दरसाना था। उन कृपा-कटाक्षों का बदला बलि होकर जहाँ चुकाना था॥ मैं सदा रूठती ही आई, प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना। वह मान बाण-सा चुभता है,… Continue reading चलते समय / सुभद्राकुमारी चौहान

फूल के प्रति / सुभद्राकुमारी चौहान

डाल पर के मुरझाए फूल! हृदय में मत कर वृथा गुमान। नहीं है सुमन कुंज में अभी इसी से है तेरा सम्मान॥ मधुप जो करते अनुनय विनय बने तेरे चरणों के दास। नई कलियों को खिलती देख नहीं आवेंगे तेरे पास॥ सहेगा कैसे वह अपमान? उठेगी वृथा हृदय में शूल। भुलावा है, मत करना गर्व… Continue reading फूल के प्रति / सुभद्राकुमारी चौहान

मुरझाया फूल / सुभद्राकुमारी चौहान

यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत। स्वयं बिखरने वाली इसकी पंखड़ियाँ बिखराना मत॥ गुजरो अगर पास से इसके इसे चोट पहुँचाना मत। जीवन की अंतिम घड़ियों में देखो, इसे रुलाना मत॥ अगर हो सके तो ठंडी बूँदें टपका देना प्यारे! जल न जाए संतप्त-हृदय शीतलता ला देना प्यारे!!

नीम / सुभद्राकुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे। तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥ ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं। निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥ हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है। उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥ नहिं रंच-मात्र सुवास… Continue reading नीम / सुभद्राकुमारी चौहान

इसका रोना / सुभद्राकुमारी चौहान

तुम कहते हो – मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है | मैं कहती हूँ – इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है || सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे | बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे || 1 || ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो |… Continue reading इसका रोना / सुभद्राकुमारी चौहान

झाँसी की रानी की समाधि पर / सुभद्राकुमारी चौहान

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी | जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी || यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की | अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की || यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी | उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति… Continue reading झाँसी की रानी की समाधि पर / सुभद्राकुमारी चौहान

मेरा जीवन / सुभद्राकुमारी चौहान

मैंने हँसना सीखा है मैं नहीं जानती रोना; बरसा करता पल-पल पर मेरे जीवन में सोना। मैं अब तक जान न पाई कैसी होती है पीडा; हँस-हँस जीवन में कैसे करती है चिंता क्रिडा। जग है असार सुनती हूँ, मुझको सुख-सार दिखाता; मेरी आँखों के आगे सुख का सागर लहराता। उत्साह, उमंग निरंतर रहते मेरे… Continue reading मेरा जीवन / सुभद्राकुमारी चौहान

नीम / सुभद्राकुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे। तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥ ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं। निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥ हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है। उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥ नहिं रंच-मात्र सुवास… Continue reading नीम / सुभद्राकुमारी चौहान

झिलमिल तारे / सुभद्राकुमारी चौहान

कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं झिलमिल-झिलमिल तारे? धीमे प्रकाश में कैसे तुम चमक रहे मन मारे।। अपलक आँखों से कह दो किस ओर निहारा करते? किस प्रेयसि पर तुम अपनी मुक्तावलि वारा करते? करते हो अमिट प्रतीक्षा, तुम कभी न विचलित होते। नीरव रजनी अंचल में तुम कभी न छिप कर सोते।। जब निशा प्रिया… Continue reading झिलमिल तारे / सुभद्राकुमारी चौहान