इस तरह उपेक्षा मेरी, क्यों करते हो मतवाले! आशा के कितने अंकुर, मैंने हैं उर में पाले॥ विश्वास-वारि से उनको, मैंने है सींच बढ़ाए। निर्मल निकुंज में मन के, रहती हूँ सदा छिपाए॥ मेरी साँसों की लू से कुछ आँच न उनमें आए। मेरे अंतर की ज्वाला उनको न कभी झुलसाए॥ कितने प्रयत्न से उनको,… Continue reading उपेक्षा / सुभद्राकुमारी चौहान
अनोखा दान / सुभद्राकुमारी चौहान
अपने बिखरे भावों का मैं गूँथ अटपटा सा यह हार। चली चढ़ाने उन चरणों पर, अपने हिय का संचित प्यार॥ डर था कहीं उपस्थिति मेरी, उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा मेरे इन भावों का मूल्य? संकोचों में डूबी मैं जब पहुँची उनके आँगन में कहीं उपेक्षा करें न मेरी,… Continue reading अनोखा दान / सुभद्राकुमारी चौहान
परिचय / सुभद्राकुमारी चौहान
क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं ललित-कलित कविताएं। चाहो तो चित्रित कर दूँ जीवन की करुण कथाएं॥ सूना कवि-हृदय पड़ा है, इसमें साहित्य नहीं है। इस लुटे हुए जीवन में, अब तो लालित्य नहीं है॥ मेरे प्राणों का सौदा, करती अंतर की ज्वाला। बेसुध-सी करती जाती, क्षण-क्षण वियोग की हाला॥ नीरस-सा होता जाता, जाने… Continue reading परिचय / सुभद्राकुमारी चौहान
प्रथम दर्शन / सुभद्राकुमारी चौहान
प्रथम जब उनके दर्शन हुए, हठीली आँखें अड़ ही गईं। बिना परिचय के एकाएक हृदय में उलझन पड़ ही गई॥ मूँदने पर भी दोनों नेत्र, खड़े दिखते सम्मुख साकार। पुतलियों में उनकी छवि श्याम मोहिनी, जीवित जड़ ही गई॥ भूल जाने को उनकी याद, किए कितने ही तो उपचार। किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति छाप-सी दिल… Continue reading प्रथम दर्शन / सुभद्राकुमारी चौहान
प्रियतम से / सुभद्राकुमारी चौहान
बहुत दिनों तक हुई परीक्षा अब रूखा व्यवहार न हो। अजी, बोल तो लिया करो तुम चाहे मुझ पर प्यार न हो॥ जरा जरा सी बातों पर मत रूठो मेरे अभिमानी। लो प्रसन्न हो जाओ गलती मैंने अपनी सब मानी॥ मैं भूलों की भरी पिटारी और दया के तुम आगार। सदा दिखाई दो तुम हँसते… Continue reading प्रियतम से / सुभद्राकुमारी चौहान
चिंता / सुभद्राकुमारी चौहान
लगे आने, हृदय धन से कहा मैंने कि मत आओ। कहीं हो प्रेम में पागल न पथ में ही मचल जाओ॥ कठिन है मार्ग, मुझको मंजिलें वे पार करनीं हैं। उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें शायद फिसल जाओ॥ तुम्हें कुछ चोट आ जाए कहीं लाचार लौटूँ मैं। हठीले प्यार से व्रत-भंग की घड़ियाँ निकट लाओ॥
समर्पण / सुभद्राकुमारी चौहान
सूखी सी अधखिली कली है परिमल नहीं, पराग नहीं। किंतु कुटिल भौंरों के चुंबन का है इन पर दाग नहीं॥ तेरी अतुल कृपा का बदला नहीं चुकाने आई हूँ। केवल पूजा में ये कलियाँ भक्ति-भाव से लाई हूँ॥ प्रणय-जल्पना चिन्त्य-कल्पना मधुर वासनाएं प्यारी। मृदु-अभिलाषा, विजयी आशा सजा रहीं थीं फुलवारी॥ किंतु गर्व का झोंका आया… Continue reading समर्पण / सुभद्राकुमारी चौहान
भ्रम / सुभद्राकुमारी चौहान
देवता थे वे, हुए दर्शन, अलौकिक रूप था। देवता थे, मधुर सम्मोहन स्वरूप अनूप था॥ देवता थे, देखते ही बन गई थी भक्त मैं। हो गई उस रूपलीला पर अटल आसक्त मैं॥ देर क्या थी? यह मनोमंदिर यहाँ तैयार था। वे पधारे, यह अखिल जीवन बना त्यौहार था॥ झाँकियों की धूम थी, जगमग हुआ संसार… Continue reading भ्रम / सुभद्राकुमारी चौहान
जीवन-फूल / सुभद्राकुमारी चौहान
मेरे भोले मूर्ख हृदय ने कभी न इस पर किया विचार। विधि ने लिखी भाल पर मेरे सुख की घड़ियाँ दो ही चार॥ छलती रही सदा ही मृगतृष्णा सी आशा मतवाली। सदा लुभाया जीवन साकी ने दिखला रीती प्याली॥ मेरी कलित कामनाओं की ललित लालसाओं की धूल। आँखों के आगे उड़-उड़ करती है व्यथित हृदय… Continue reading जीवन-फूल / सुभद्राकुमारी चौहान
मेरे पथिक / सुभद्राकुमारी चौहान
हठीले मेरे भोले पथिक! किधर जाते हो आकस्मात। अरे क्षण भर रुक जाओ यहाँ, सोच तो लो आगे की बात॥ यहाँ के घात और प्रतिघात, तुम्हारा सरस हृदय सुकुमार। सहेगा कैसे? बोलो पथिक! सदा जिसने पाया है प्यार॥ जहाँ पद-पद पर बाधा खड़ी, निराशा का पहिरे परिधान। लांछना डरवाएगी वहाँ, हाथ में लेकर कठिन कृपाण॥… Continue reading मेरे पथिक / सुभद्राकुमारी चौहान