स्वदेश के प्रति / सुभद्राकुमारी चौहान

आ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ, स्वागत करती हूँ तेरा। तुझे देखकर आज हो रहा, दूना प्रमुदित मन मेरा॥ आ, उस बालक के समान जो है गुरुता का अधिकारी। आ, उस युवक-वीर सा जिसको विपदाएं ही हैं प्यारी॥ आ, उस सेवक के समान तू विनय-शील अनुगामी सा। अथवा आ तू युद्ध-क्षेत्र में कीर्ति-ध्वजा का स्वामी सा॥… Continue reading स्वदेश के प्रति / सुभद्राकुमारी चौहान

विजयी मयूर / सुभद्राकुमारी चौहान

तू गरजा, गरज भयंकर थी, कुछ नहीं सुनाई देता था। घनघोर घटाएं काली थीं, पथ नहीं दिखाई देता था॥ तूने पुकार की जोरों की, वह चमका, गुस्से में आया। तेरी आहों के बदले में, उसने पत्थर-दल बरसाया॥ तेरा पुकारना नहीं रुका, तू डरा न उसकी मारों से। आखिर को पत्थर पिघल गए, आहों से और… Continue reading विजयी मयूर / सुभद्राकुमारी चौहान

प्रतीक्षा / सुभद्राकुमारी चौहान

बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित नयनों के मदु मुक्ता-जाल। उनमें जाने कितनी ही अभिलाषाओं के पल्लव पाल॥ बिता दिए मैंने कितने ही व्याकुल दिन, अकुलाई रात। नीरस नैन हुए कब करके उमड़े आँसू की बरसात॥ मैं सुदूर पथ के कलरव में, सुन लेने को प्रिय की बात। फिरती विकल बावली-सी सहती अपवादों के आघात॥ किंतु न… Continue reading प्रतीक्षा / सुभद्राकुमारी चौहान

विदा / सुभद्राकुमारी चौहान

अपने काले अवगुंठन को रजनी आज हटाना मत। जला चुकी हो नभ में जो ये दीपक इन्हें बुझाना मत॥ सजनि! विश्व में आज तना रहने देना यह तिमिर वितान। ऊषा के उज्ज्वल अंचल में आज न छिपना अरी सुजान॥ सखि! प्रभात की लाली में छिन जाएगी मेरी लाली। इसीलिए कस कर लपेट लो, तुम अपनी… Continue reading विदा / सुभद्राकुमारी चौहान

वेदना / सुभद्राकुमारी चौहान

दिन में प्रचंड रवि-किरणें मुझको शीतल कर जातीं। पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी, हे शशि! है मुझे जलाती॥ संध्या की सुमधुर बेला, सब विहग नीड़ में आते। मेरी आँखों के जीवन, बरबस मुझसे छिन जाते॥ नीरव निशि की गोदी में, बेसुध जगती जब होती। तारों से तुलना करते, मेरी आँखों के मोती॥ झंझा के उत्पातों सा,… Continue reading वेदना / सुभद्राकुमारी चौहान

मेरा गीत / सुभद्राकुमारी चौहान

जब अंतस्तल रोता है, कैसे कुछ तुम्हें सुनाऊँ? इन टूटे से तारों पर, मैं कौन तराना गाऊँ?? सुन लो संगीत सलोने, मेरे हिय की धड़कन में। कितना मधु-मिश्रित रस है, देखो मेरी तड़पन में॥ यदि एक बार सुन लोगे, तुम मेरा करुण तराना। हे रसिक! सुनोगे कैसे? फिर और किसी का गाना॥ कितना उन्माद भरा… Continue reading मेरा गीत / सुभद्राकुमारी चौहान

पूछो / सुभद्राकुमारी चौहान

विफल प्रयत्न हुए सारे, मैं हारी, निष्ठुरता जीती। अरे न पूछो, कह न सकूँगी, तुमसे मैं अपनी बीती॥ नहीं मानते हो तो जा उन मुकुलित कलियों से पूछो। अथवा विरह विकल घायल सी भ्रमरावलियों से पूछो॥ जो माली के निठुर करों से असमय में दी गईं मरोड़। जिनका जर्जर हृदय विकल है, प्रेमी मधुप-वृंद को… Continue reading पूछो / सुभद्राकुमारी चौहान

आराधना / सुभद्राकुमारी चौहान

जब मैं आँगन में पहुँची, पूजा का थाल सजाए। शिवजी की तरह दिखे वे, बैठे थे ध्यान लगाए॥ जिन चरणों के पूजन को यह हृदय विकल हो जाता। मैं समझ न पाई, वह भी है किसका ध्यान लगाता? मैं सन्मुख ही जा बैठी, कुछ चिंतित सी घबराई। यह किसके आराधक हैं, मन में व्याकुलता छाई॥… Continue reading आराधना / सुभद्राकुमारी चौहान

व्याकुल चाह / सुभद्राकुमारी चौहान

सोया था संयोग उसे किस लिए जगाने आए हो? क्या मेरे अधीर यौवन की प्यास बुझाने आए हो?? रहने दो, रहने दो, फिर से जाग उठेगा वह अनुराग। बूँद-बूँद से बुझ न सकेगी, जगी हुई जीवन की आग॥ झपकी-सी ले रही निराशा के पलनों में व्याकुल चाह। पल-पल विजन डुलाती उस पर अकुलाए प्राणों की… Continue reading व्याकुल चाह / सुभद्राकुमारी चौहान

तुम / सुभद्राकुमारी चौहान

जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो, है जीवन में जीवन। कोई नहीं छीन सकता तुमको मुझसे मेरे धन॥ आओ मेरे हृदय-कुंज में निर्भय करो विहार। सदा बंद रखूँगी मैं अपने अंतर का द्वार॥ नहीं लांछना की लपटें प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं। पीड़ित करने तुम्हें वेदनाएं न वहाँ आएँगीं॥ अपने उच्छ्वासों से मिश्रित… Continue reading तुम / सुभद्राकुमारी चौहान